अमेरिका और ईरान के तनावपूर्ण रिश्तों के बीच कूटनीति पहल एक बार फिर तेज हो गई है. पहले दौर की नाकाम बातचीत के बाद दोनों देशों ने दूसरे राउंड की वार्ता के लिए हामी भर दी है. माना जा रहा है कि जल्द ही पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठ सकते हैं. लेकिन क्या इस बार कोई ठोस रास्ता निकलेगा या फिर बातचीत फिर से गतिरोध में फंस जाएगी.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देश समझौते के बहुत करीब हैं. उन्होंने संकेत दिया कि अगले कुछ दिनों में बड़ी प्रगति देखने को मिल सकती है. वहीं अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी माना कि दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास जरूर है, लेकिन बातचीत के जरिए इसे कम किया जा सकता है. पहले दौर की वार्ता 41 घंटे तक चली, लेकिन किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी.

अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट में उसकी रणनीति को बड़ा मुद्दा बताया, जबकि ईरान ने अमेरिकी शर्तों को ही बातचीत विफल होने की वजह ठहराया. दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी इतनी गहरी है कि हर प्रस्ताव शक की नजर से देखा जा रहा है. इसके बावजूद दूसरे राउंड की बातचीत के लिए माहौल बनना इस बात का संकेत है कि दोनों देश सीधे टकराव से बचना चाहते हैं.

ईरान की ओर से भी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाई गई है. उसने फ्रांस समेत कई देशों से संपर्क साधकर अपना पक्ष रखा है. उसने यह संकेत दिया कि वह बातचीत के जरिए समाधान चाहता है. ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने साफ कहा है कि उनका देश युद्ध नहीं चाहता, लेकिन किसी भी तरह का दबाव या सरेंडर स्वीकार नहीं करेगा. भारत में ईरानी राजदूत मो. फतहली ने भी स्थायी समाधान की वकालत की है.

इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान पर दबाव जारी रहा तो तेहरान सभी विकल्पों के लिए तैयार है. सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के सामने कई कड़ी शर्तें रखी हैं, जो इस बातचीत की सबसे बड़ी बाधा मानी जा रही हैं. इन शर्तों में शामिल 10 बातों के मनाए बगैर अमेरिका इस शांति वार्ता की प्रक्रिया में आगे बढ़ेगा या नहीं, ये भविष्य का सबसे बड़ा सवाल है. इस पर ईरान की रुख भी अहम है.

ट्रंप की 10 बड़ी शर्तें इस प्रकार हैं…

1. ईरान के सभी परमाणु ठिकानों पर अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की पूरी छूट.

2. 440 किलो एनरिच्ड यूरेनियम सौंपना और संवर्धन कार्यक्रम बंद करना.

3. सभी तरह की मिसाइलों के भंडार को सार्वजनिक करना.

4. लंबी दूरी की मिसाइलों (ICBMs) पर नियंत्रण.

5. होर्मुज स्ट्रेट से नियंत्रण हटाना और इसे अंतरराष्ट्रीय मार्ग मानना.

6. हिज्बुल्लाह, हमास और हूती जैसे प्रॉक्सी नेटवर्क खत्म करना.

7. इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) और बासिज मिलिशिया को भंग करना

8. अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करना

9. जनवरी नरसंहार के दोषियों को सजा देना

10. होर्मुज स्ट्रेट को अंतरराष्ट्रीय मार्ग की मान्यता देना.

इन शर्तों को लेकर माना जा रहा है कि ईरान के लिए पूरी तरह सहमत होना आसान नहीं होगा, क्योंकि यह उसकी रणनीतिक ताकत और संप्रभुता से जुड़ा मामला है. सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है. अमेरिका चाहता है कि ईरान अगले 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद कर दे और अपना मौजूदा 440 किलो स्टॉक सौंप दे. लेकिन ईरान ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया है.

तेहरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और ऊर्जा जरूरतों के लिए है. हालांकि, उसने संकेत दिया है कि वह कुछ वर्षों के लिए संवर्धन पर रोक लगाने जैसे मिडिल ग्राउंड पर विचार कर सकता है. इस बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का प्रस्ताव भी चर्चा में है. इसके तहत ईरान अपना एनरिच्ड यूरेनियम रूस को सौंप सकता है. वो उसे प्रोसेस कर परमाणु ईंधन के रूप में वापस कर देगा.

इससे ईरान की ऊर्जा जरूरतें भी पूरी होंगी और अमेरिका की परमाणु हथियारों को लेकर चिंता भी कम होगी. ईरान भी बातचीत में खाली हाथ नहीं है. उसकी मांगों में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाना, फ्रीज की गई संपत्तियों की बहाली, हमले न करने की लिखित गारंटी और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा शामिल है. इससे साफ है कि कि दोनों देशों के बीच यह बातचीत कूटनीतिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है.

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