ग्राउंड रिपोर्ट: SIR के बाद बढ़ी टेंशन, छिटमहल के लोगों को सता रहा नागरिकता खोने का डर – coochbehar enclave voters citizenship crisis sir voter list bengal elections india bangladesh enclave NTC AGKP IWTH

ByCrank10

April 16, 2026 , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,


पश्चिम बंगाल के कूचबिहार के चिटमहल के इलाके में रहने वाले लोगों की परेशानी एक बार फिर बढ़ गई है. पहले से ही बुनियादी सुविधाओं की कमी झेल रहे ये लोग अब अपनी नागरिकता को लेकर चिंता में हैं.

भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित ये छिटमहल ऐसे इलाके हैं जो भौगोलिक रूप से एक देश के भीतर होते हुए भी दूसरे देश के हिस्से थे. साल 2015 में भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौता के तहत इन एंक्लेव्स का आदान-प्रदान हुआ और यहां रहने वाले लोगों को नागरिकता चुनने का मौका मिला.

इस समझौते के बाद हजारों लोगों को भारत की नागरिकता और वोटिंग राइट्स मिले. लेकिन अब करीब एक दशक बाद फिर से वही लोग अपने अधिकारों को लेकर असमंजस में हैं.

SIR प्रक्रिया में कटे नाम

हाल ही में SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हट गए. दक्षिण मशालडांगा जैसे इलाके में करीब 1400 की आबादी में से लगभग 300 लोगों के नाम कटने का दावा किया जा रहा है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि इनमें से कई लोग ‘जेन्युइन वोटर्स’ हैं, जिनके पास पुराने सर्वे के दस्तावेज भी मौजूद हैं. इसके बावजूद उनके नाम सूची में शामिल नहीं किए गए.

लोगों की क्या है परेशानी?

यहां के निवासी सत्तार अली बताते हैं कि उन्होंने कई बार कोशिश की, लेकिन उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं जुड़ पाया. वहीं कई महिलाओं के नाम भी शादी के बाद कट गए हैं, जिससे उनकी पहचान और अधिकार दोनों प्रभावित हो रहे हैं.

यह भी पढ़ें: ग्राउंड रिपोर्ट: फुरफुरा शरीफ से उठी असंतोष की लहर, 30 फीसदी वोटरों पर असर रखने वाले नेता नाराज

एक अन्य निवासी मानेक अली शेख का कहना है कि उनके पास सर्वे का रिकॉर्ड है, नाम और स्पेलिंग सब सही है, फिर भी उनका नाम हटा दिया गया. इससे उन्हें डर है कि कहीं उनकी नागरिकता पर ही सवाल न खड़ा हो जाए.

पहले से ही बदहाल हालात

दक्षिण मशालडांगा जैसे इलाकों की हालत पहले से ही खराब है. न यहां कोई स्कूल है, न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र. एक आंगनवाड़ी केंद्र शुरू हुआ था, लेकिन कुछ सालों बाद वह भी बंद हो गया.

ऐसे में जब वोटर लिस्ट से नाम कटते हैं, तो यह सिर्फ चुनावी अधिकार का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि पहचान और नागरिकता के अस्तित्व का सवाल बन जाता है.

बढ़ती चिंता

2015 के समझौते के बाद जो लोग खुद को सुरक्षित मान रहे थे, अब वही लोग फिर से असुरक्षा और अनिश्चितता में जी रहे हैं. अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो इन इलाकों में रहने वाले ‘भारत के नए नागरिकों’ के सामने पहचान और अधिकार का संकट और गहरा सकता है.

—- समाप्त —-



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed