अमेरिकी सेना के एक बड़े अधिकारी ने चेतावनी दी है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अंतरिक्ष में एक बड़ा हमला करने की योजना बना रहे हैं. यह हमला पर्ल हार्बर जैसा होगा, जो 1941 में द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान ने अमेरिका पर अचानक किया था.
अमेरिकी स्पेस कमांड के प्रमुख जनरल स्टीफन व्हाइटिंग ने कहा कि रूस अंतरिक्ष में परमाणु हथियार लगाने की सोच रहा है. अगर यह हथियार काम में आया तो पृथ्वी के आस-पास निचली कक्षा में घूमने वाले सारे सैटेलाइट खतरे में पड़ जाएंगे. इससे संचार, जीपीएस, मौसम की जानकारी और सेना के काम वाले सैटेलाइट बर्बाद हो जाएंगे.
जनरल स्टीफन व्हाइटिंग ने ब्रिटेन के अखबार ‘द टाइम्स’ को बताया कि ट्रंप प्रशासन इस योजना से परेशान है. उन्होंने कहा कि रूस एक परमाणु एंटी-सैटेलाइट हथियार को कक्षा में रखने की सोच रहा है. यह हथियार लो अर्थ ऑर्बिट में सभी देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचा सकता है.
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उन्होंने जोर देकर कहा कि इसे अमेरिका बर्दाश्त नहीं कर सकता. रूस अंतरिक्ष में काफी ताकतवर देश है. वह लगातार ऐसे हथियार बना रहा है जो दुश्मन के सैटेलाइट्स को नष्ट कर सकें. जनरल ने यह भी बताया कि रूस अमेरिका और नाटो की पारंपरिक सेना से कमजोर महसूस करता है. इसलिए वह अंतरिक्ष के जरिए नई तरकीबें निकाल रहा है ताकि अमेरिका और नाटो की ताकत को कम कर सके.
अंतरिक्ष संधि का उल्लंघन क्यों बड़ा मुद्दा है?
अगर रूस सच में अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखता है तो यह 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी का सीधा उल्लंघन होगा. इस संधि पर रूस भी हस्ताक्षर कर चुका है. इस संधि में साफ लिखा है कि कोई भी देश अंतरिक्ष में परमाणु हथियार या बड़े विनाश वाले हथियार नहीं रख सकता.
यह संधि इसलिए बनाई गई थी ताकि अंतरिक्ष को शांतिपूर्ण रखा जाए. कोई भी देश वहां से पृथ्वी पर हमला न कर सके. जनरल व्हाइटिंग ने यह नहीं बताया कि अमेरिका को रूस की इस योजना की जानकारी कैसे मिली, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि डोनाल्ड ट्रंप सरकार इसे बहुत गंभीरता से ले रही है.
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रूस पहले से ही अंतरिक्ष में अपनी आक्रामकता बढ़ा रहा है. जनरल व्हाइटिंग ने बताया कि रूस सैटेलाइट की संचार व्यवस्था और जीपीएस सिग्नल को जाम करने की कोशिश कर रहा है. यह जाम इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि इससे सिविलियन एयरलाइन के विमान भी खतरे में पड़ रहे हैं. यह रूस की नई रणनीति का हिस्सा है जिसमें वह पारंपरिक युद्ध के अलावा अंतरिक्ष को भी युद्ध का मैदान बना रहा है. इससे सैटेलाइट पर निर्भर सारी दुनिया की सेवाएं ठप हो सकती हैं – बैंकिंग, इंटरनेट, टीवी, मोबाइल नेटवर्क सब प्रभावित होंगे.
यूरोप और नाटो अब अपनी सुरक्षा खुद संभाल रहे हैं
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि हमें ज्यादा निवेश करना होगा, ज्यादा उत्पादन करना होगा और दोनों काम तेजी से करने होंगे. नाटो के महासचिव मार्क रुट्टे ने भी कहा कि मजबूत यूरोप का मतलब मजबूत नाटो है. उन्होंने यूक्रेन को मदद जारी रखने और महत्वपूर्ण ढांचे की सुरक्षा पर भी बात की.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो पर अपना समर्थन कम करने की धमकी दी है. वे कहते हैं कि यूरोप को अपनी सुरक्षा खुद संभालनी चाहिए ताकि अमेरिका चीन जैसे दूसरे खतरे पर ध्यान दे सके. पिछले साल नाटो के सदस्य देशों ने रक्षा खर्च को अपने देश की जीडीपी का 3.5 प्रतिशत करने का वादा किया था. लेकिन यूरोप की हथियार बनाने वाली कंपनियां अभी भी जरूरत के मुताबिक तेजी से उत्पादन नहीं कर पा रही हैं. यूरोपीय देश अब समझ रहे हैं कि दशकों तक अमेरिका पर भरोसा करने का समय खत्म हो गया है. अब उन्हें अपनी सुरक्षा खुद हाथ में लेनी होगी.
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नाटो अधिकारी कहते हैं कि आनेवाला सम्मेलन अंकारा में होगा जहां हथियार उत्पादन का मुद्दा मुख्य चर्चा का विषय रहेगा. रुट्टे ने ट्रंप से हाल ही में वॉशिंगटन में मुलाकात की थी. वे चाहते हैं कि यूरोप और नाटो मिलकर ज्यादा मजबूत बने. यूरोपियन यूनियन भी अब रक्षा के क्षेत्र में ज्यादा एक्टिव हो रहा है. हालांकि नाटो कहता है कि यूरोपियन यूनियन को सिर्फ फंडिंग और सहयोग पर फोकस करना चाहिए, सैन्य प्लानिंग नाटो का काम है.
कुल मिलाकर, रूस की इस अंतरिक्ष योजना ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है. अगर यह योजना सफल हुई तो न सिर्फ अमेरिका बल्कि सारी दुनिया की संचार व्यवस्था चरमरा सकती है. यूरोप अब अपनी सेना और हथियार उद्योग को तेजी से मजबूत कर रहा है ताकि भविष्य के किसी भी खतरे से निपट सके.
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