कोलकाता तो राजधानी था… फिर भी बॉम्बे में क्यों चली भारत की पहली ट्रेन? – indian railways first train history bombay thane Full Story tedu


जब अंग्रेजों ने भारत में ट्रेन की शुरुआत की थी, उस वक्त उन्हें भी ये भरोसा नहीं था कि भारत में रेलवे से कमाई होगी या नहीं. लेकिन, अब जो भारत में रेल से हो रहा है, उसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की होगी. आज भारतीय रेल मुनाफे में है और देश के लिए बेहद जरूरी बन चुकी है. करीब 70,000 किलोमीटर लंबा ये नेटवर्क हर दिन लाखों टन सामान ढोता है और करोड़ों लोगों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाता है. ये उन 98% भारतीयों के लिए लाइफलाइन है, जो शायद कभी हवाई जहाज से सफर नहीं कर पाते. और ये सब शुरू हुआ था आज से ठीक 173 साल पहले.

दरअसल, गुरुवार यानी 16 अप्रैल को भारतीय रेल ने अपनी 173वीं सालगिरह मनाई है. इसी दिन पहली पैसेंजर ट्रेन बॉम्बे (आज का मुंबई) के बोरी बंदर से ठाणे के बीच चली थी. उस वक्त करीब 33 किलोमीटर का सफर तय करने में उस वक्त लगभग 75 मिनट लगे थे और इस ट्रेन में करीब 400 यात्री सवार थे. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शुरुआत बॉम्बे से ही क्यों हुई? आम तौर पर तो यही लगता है कि ब्रिटिश राज की राजधानी कलकत्ता (आज का कोलकाता) से पहली ट्रेन चलनी चाहिए थी.

इसी बीच, केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी एक खास कोलाज शेयर किया है. इसमें ऊपर की तरफ एक पुरानी भाप से चलने वाली ट्रेन ईंट-पत्थर के पुल पर दौड़ती दिख रही है, और नीचे एक आधुनिक अमृत भारत ट्रेन नजर आ रही है. इस तस्वीर के साथ उन्होंने कैप्शन लिखा- “Journey continues…”.

कोलकाता में क्यों नहीं चली पहली ट्रेन?

अब सवाल ये है कि ब्रिटिश राज की राजधानी कलकत्ता थी, लेकिन फिर भी वहां से पहली पैसेंजर ट्रेन क्यों नहीं चली? इस रेस में आखिरकार बॉम्बे आगे निकल गया. कलकत्ता में पहली पैसेंजर ट्रेन 15 अगस्त 1854 को चली, जब हावड़ा से हुगली के बीच ट्रेन शुरू हुई. यानी बॉम्बे-ठाणे के रिकॉर्ड के करीब एक साल बाद. कलकत्ता ये रेस इसलिए हार गया, क्योंकि ब्रिटेन से इंजन लेकर आ रहा एक जहाज रास्ता भटककर ऑस्ट्रेलिया पहुंच गया. फिर रास्ते में कई गड़बड़ियां और देरी हो गईं.

वहीं, डिब्बे लेकर आ रहा दूसरा जहाज हुगली नदी के पास सैंडहेड्स इलाके में डूब गया. ये इलाका अपने खतरनाक रेत के टीलों के लिए बदनाम था और नाविकों के लिए हमेशा डर का कारण रहा है.  इसका जिक्र द सिटी ड्रेडफुल नाइट में भी मिलता है. इसके अलावा, फ्रेंच कंट्रोल वाले चंदननगर में परमिशन से जुड़ी दिक्कतें और कुछ स्थानीय विरोध भी सामने आए. इन सब वजहों से बॉम्बे आगे निकल गया और भारत की पहली ट्रेन चलाने का श्रेय ले गया. मुंबई के लेखक और पत्रकार और रेल के जानकार राजेंद्र बी. अकलेकर के मुताबिक यही वजहें थीं जिनकी वजह से कलकत्ता पीछे रह गया.

कलकत्ता भले ही जमीन पर रेल चलाने में पीछे रह गया, लेकिन सोच और प्लानिंग के मामले में वो काफी आगे था. इंडिया रेलवेज फैन क्लब एसोसिएशन में छपे एक लेख टू मैन एंड ए रेलवे लाइन में लेखिका और रेल इतिहासकार अनुराधा कुमार बताती हैं कि 1840 के दशक में ही कलकत्ता से रेलवे शुरू करने की योजना बन चुकी थी. ये प्लान मशहूर कारोबारी द्वारकानाथ टैगोर (जो रविंद्रनाथ टैगोर के दादा थे) और इंजीनियर रॉलैंड मैकडोनाल्ड स्टेफेंसन ने मिलकर बनाया था. उनका सपना था कि पूर्वी भारत के इस बड़े व्यापारिक केंद्र को रानीगंज के कोयला खदानों से जोड़ा जाए.

उस समय कलकत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी के पूरे ऑपरेशन का केंद्र था और यहां से व्यापार की कड़ियां पूर्व में कैंटन (चीन) से लेकर पश्चिम में लंदन तक फैली हुई थीं. ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1845 में ही हो गई थी यानी बॉम्बे में रेलवे पर गंभीर काम शुरू होने से कई साल पहले.  लेकिन इसके बावजूद, पश्चिमी भारत में रेलवे का काम तेजी से आगे बढ़ा और आखिरकार बॉम्बे ने बाजी मार ली.

भारत में क्यों आई ट्रेन?

रेलवे एडमिनिस्ट्रेटर और इतिहासकार जीएस खोसला ने अपनी किताब ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन रेलवे में लिखा है कि रेलवे देश के ‘आर्थिक विकास, सुरक्षा, खेती और उद्योग के विस्तार और लोगों को जोड़ने में एक अहम भूमिका बन गईं. अंग्रेजों के लिए भी रेल बेहद जरूरी थी ताकि सैनिकों को जल्दी से एक जगह से दूसरी जगह भेजा जा सके और कपास व कोयले जैसे कच्चे माल को बंदरगाहों तक पहुंचाया जा सके, जिससे उनका व्यापार चलता रहे. किताब ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ इंडियन रेलवे में लेखक राजेंद्र बी. अकलेकर ने रेलवे नेटवर्क को ‘अनरिलाएबल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क’ बताया है.

भारत में रेलवे का आइडिया सबसे पहले 1830 के दशक में सामने आया था. इसकी सबसे बड़ी वजह इंडस्ट्रियल जरूरतें थीं, खासतौर पर कपास (कॉटन) को बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट करना. इसके लिए अंदरूनी इलाकों (हिंटरलैंड) को बंदरगाहों से जोड़ने का प्लान बनाया गया. लेकिन इस आइडिया को जमीन पर उतारना आसान नहीं था. इतना बड़ा और अनजान भूगोल, वहां काम करना- ब्रिटिश प्लानर्स और इंजीनियर्स के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था.

धीरे-धीरे रेलवे कंपनियों का कॉन्सेप्ट सामने आया. हालांकि, 1850 के शुरुआती सालों तक मद्रास प्रेसिडेंसी में कुछ छोटी रेल लाइनें चल भी रही थीं, जिनका इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन मटेरियल और खनिज ढोने के लिए होता था. इसके बाद दो बड़ी कंपनियां आगे आईं—पश्चिम में ग्रेट इंडियन पेनिंसुला रेलवे (GIPR) और पूर्व में ईस्ट इंडिया रेलवे(EIR). इन्हीं कंपनियों ने मिलकर भारत में पहली सही मायनों में पैसेंजर और माल दोनों तरह के इस्तेमाल वाली, टिकाऊ रेलवे लाइन की शुरुआत करने में अहम भूमिका निभाई.

दुनिया की पहली पब्लिक रेलवे लाइन 1825 में इंग्लैंड के स्टॉकटन और डार्लिंगटन के बीच शुरू हुई थी, जो नॉर्थ सी के पास पड़ता है. अब बारी थी कि ऐसी ही ट्रेन भारत में आ जाए.

21 तोपों की मिली सलामी

भारत की पहली पैसेंजर ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को बॉम्बे के बोरी बंदर से ठाणे के बीच चली थी। ये सिर्फ एक सफर नहीं, बल्कि एक बड़ा आयोजन था- जिसे 21 तोपों की सलामी के साथ सेलिब्रेट किया गया. भारतीय रेल की शुरुआत सिर्फ 33 किलोमीटर के एक प्रयोग के तौर पर हुई थी, लेकिन आज ये दुनिया के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क में से एक बन चुकी है. अब ये 68,000 किलोमीटर से ज्यादा फैल चुकी है और देश के लगभग हर कोने को जोड़ती है.

हाल ही में मिजोरम की राजधानी आइजोल भी इस नेटवर्क से जुड़ी, जो गुवाहाटी, ईटानगर और अगरतला के बाद उत्तर-पूर्व की चौथी राजधानी बनी, जहां रेल पहुंची. आखिर में ये मायने नहीं रखता कि बॉम्बे पहले पहुंचा या कलकत्ता। असली बात ये है कि रेलवे नेटवर्क ने भारत में अपनी जड़ें जमा लीं और देश को बदलने की ताकत बन गया. आज भारत में ट्रेनें हर दिशा में दौड़ रही हैं, और कभी लॉर्ड डलहौजी को जो शक था कि रेलवे मुनाफा कमाएंगी या नहीं- वो आज थोड़ा अजीब सा लगता है. क्योंकि भारतीय रेल ने सिर्फ कमाई ही नहीं की, बल्कि देश को जोड़ने और बनाने में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई और आज भी निभा रही है.

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