समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण बिल को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा. लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने साफ कहा कि ‘भाजपा का असली मकसद महिलाओं को सम्मान देना नहीं, बल्कि उन्हें चुनावी नारा बनाना है.’ उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि जब कल रात 8 बजे प्रधानमंत्री के संबोधन की खबर आई, तो सबको लगा कि शायद किसी महिला को प्रधानमंत्री बनाने का ऐतिहासिक ऐलान होगा, लेकिन हाथ सिर्फ मायूसी लगी. उनका मानना है कि यह बिल ‘आधी आबादी’ को हक देने के बहाने समाज को बांटने की एक सोची-समझी रणनीति है.
भाजपा की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए अखिलेश ने कहा कि यह पार्टी पहले लोगों को बांटती है और फिर उन्हें डराकर अपने पाले में लाने की कोशिश करती है, लेकिन अब यह भय का खेल जनता के बीच नहीं चलने वाला. भाजपा अब यही फॉर्मूला महिलाओं के साथ भी अपना रही है. हालांकि, पुरानी सोच वाली महिलाओं को तो शायद वे गुमराह कर लें, लेकिन आज के दौर की जागरूक और पढ़ी-लिखी बेटियां अब इनके बहकावे में नहीं आने वालीं.
अखिलेश यादव ने इस कदम को ‘तथाकथित महिला बिल’ करार देते हुए कहा कि जनता के गुस्से को दबाने के लिए इसे जल्दबाजी में लाया गया है. उन्होंने सीधा सवाल दागा कि जिस पार्टी ने अपने संगठन के भीतर महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया, वह देश की 33 प्रतिशत महिलाओं को क्या अधिकार देगी? उनके अनुसार, बिल का असल उद्देश्य महिलाओं को सशक्त करना नहीं, बल्कि उन्हें आपस में बांटना है.
PDA समाज को तोड़ने की साजिश कर रही सरकार
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का हवाला देते हुए अखिलेश ने याद दिलाया कि उन्होंने जनगणना का नियम दिया था, लेकिन मौजूदा सरकार इससे लगातार भाग रही है. यह सीधे तौर पर PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समाज को कमजोर करने की साजिश लगती है. सपा मुखिया ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी आधी आबादी को हक और सम्मान देने के पक्ष में तो है, लेकिन इसमें पिछड़े और दलित वर्ग की महिलाओं के लिए विशेष हक की बात होनी चाहिए.
इस दौरान अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि वे बिल के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि सरकार की मंशा पर उन्हें शक है. सवाल यह भी उठाया गया कि अगर 2011 की पुरानी जनगणना को ही आधार बनाया जाएगा, तो महिलाओं को उनका वास्तविक अधिकार आखिर कैसे मिल पाएगा? उनका दावा है कि इस बिल को जल्दबाजी में लाने का असली मकसद जातिगत जनगणना को रोकना है, क्योंकि जनगणना होने पर सरकार को हर वर्ग की असल आबादी बतानी पड़ेगी.
अंत में लखनऊ के चिर-परिचित अंदाज में अखिलेश ने कहा कि जनता अब इन राजनीतिक चालों को बखूबी समझ चुकी है. बिना जातिगत जनगणना और पिछड़े-दलित वर्गों की महिलाओं को ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ दिए बिना, इस बिल का कोई जमीनी लाभ नहीं दिखेगा.
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