एक ओर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार मिशन शक्ति और केंद्र की मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल के जरिए महिलाओं को सशक्त बनाने और भाषणों में बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ जैसे स्लोगनो के जरिए उन्हें साक्षर बनाने का दावा करती नहीं थकती. वहीं प्रदेश के बस्ती जिले के कलवारी क्षेत्र के एक स्कूल से बेटियों को जबरन शिक्षा से वंचित करने की एक ऐसी दास्तां सामने आई है, जिसे सुनेंगे तो आप भी कहेंगे कि हम कैसे आधुनिक भारत में जी रहे हैं. यहां के सरकारी स्कूल में पिछले 67 सालों से   गरीब बेटियों के प्रवेश पर महज इसलिए नो इंट्री है क्योंकि इस स्कूल में बालिका शौचालय नहीं है. अब आप कहेंगे कि भला ये भी कोई बात है, दरअसल कॉलेज के प्रबन्धक द्वारा मोटी कमाई के चक्कर में महिला शौचालय न होने का हवाला देकर उसकी आड़ में अपना प्राइवेट स्कूल चमकाया जा रहा है.

सरकारी के बगल में अपना प्राइवेट कॉलेज

दरअसल, पूरा मामला कलवारी क्षेत्र में स्थित झिनकू लाल त्रिवेणी राम चौधरी इंटर कॉलेज का है जहां स्कूल में पिछले सात दशकों से बेटियों के दाखिले पर रोक है और ये कोई सरकारी फरमान नहीं बल्कि प्रबंधक जी के फरमान से हो रहा है. दरअसल प्रबंधक द्वारा स्कूल में महिला शौचालय न होने के बहाने की आड़ लेकर गरीब बेटियों को पिछले कई सालों से उनके दाखिले पर रोक लगा दी है, और उसका कारण है प्रबंधक का खुद का प्राइवेट कॉलेज है जो कि इस सरकारी स्कूल से ठीक बगल में हैं. जिस वजह से बेटियों को सरकारी कॉलेज में पढ़ने से रोककर उनसे मोटी फीस लेने के लिए एडमिशन नहीं लिया जाता.

1957 से को- एड है स्कूल लेकिन लड़की एक नहीं

​हैरानी की बात यह है कि इस संस्थान को साल1957 में ही को- एड की सरकारी मान्यता मिली थी. सरकारी रिकॉर्ड में यह कॉलेज समान शिक्षा का केंद्र है, लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि यहां की दहलीज लांघना किसी भी छात्रा के लिए नामुमकिन बना दिया गया है. ​ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस अघोषित प्रतिबंध के पीछे एक सोची-समझी साजिश की बात बताई है, आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन ने पास ही में अपना एक निजी विद्यालय खोल रखा है.

निजी स्कूल में मोटी फीस देने का दबाव

सरकारी इंटर कॉलेज में लड़कियों का दाखिला रोककर उन्हें निजी स्कूल में मोटी फीस देने पर मजबूर किया जाता है. जो बेटियां प्राइवेट स्कूल की फीस नहीं भर पातीं, वे बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को विवश हैं. यह सीधे तौर पर संविधान द्वारा दिए गए शिक्षा के अधिकार का हनन है. और ऐसा नहीं है कि इस सरकारी स्कूल में बालिका शौचालय नहीं है, शौचालय है और वह भी अच्छा खासा लेकिन प्रबंधक का आदेश है तो भला कोई इसे कैसे लांघ सकता है.

​स्थानीय छात्राओं की आपबीती सुनेंगे तो आप भी हैरान हो जाएंगे, स्कूल में दाखिला लेने आई एक छात्रा ने बताया कि उसकी कई सहेलियों ने शिक्षा के लिए प्रबंधन तंत्र की मनमानी के चलते पढ़ाई छोड़ दी है.अभिभावक भी प्रबंधक के इस फरमान से परेशान हैं.

साइकिल में टॉयलेट सीट बांधकर स्कूल पहुंचा पिता

खुद की बेटी का सरकारी स्कूल में दाखिला हो जाए इसके लिए एक पिता बकायदा साइकिल में एक टॉयलेट सीट बांधकर उसे लेकर विद्यालय पहुंच गया और विद्यालय के जिम्मेदारों को टायलेट शीट देकर उसकी बेटी के दाखिला कर लेने की गुहार लगाई लेकिन स्कूल के जिम्मेदारों का दिल नहीं पसीजा. इतना सब करने के बाद भी पिता के हाथ सिर्फ और सिर्फ निराशा ही हाथ लगी.

बालिका शौचालय नहीं है, बाउंड्रीवाल भी नहीं

वहीं इस पूरे मामले में जब स्कूल के प्रिंसिपल आज्ञाराम चौधरी से बात कि तो उन्होंने सुरक्षा का हवाला देते हुए बताया कि यह सही है कि यहां बालिका शौचालय नहीं है और स्कूल में बाउंड्रीवाल भी नहीं है, जिस वजह से यहां बच्चियों के दाखिले पर रोक है ऐसा नहीं है कि यहां बच्चियों का दाखिला नहीं हुआ है. साल 2021 व 2022 में 60 से 70 लड़कियों को प्रवेश दिया गया था लेकिन उसके बाद से न कोई बच्ची दाखिला लेने के लिए आया और न किसी ने पढ़ने की इच्छा जाहिर की.

आज भी एक भी बेटी का दाखिला नहीं

अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी जमीन और सरकारी संसाधनों पर चल रहे इस कॉलेज में प्रबंधन की मर्जी कानून से ऊपर है? एक स्थानीय जागरूक निवासी प्रभाकर बेटियों की शिक्षा को लेकर अभियान छेड़ दिया है, वे कॉलेज के गेट पर बेटियों का एडमिशन करने के लिए कॉलेज को जागरूक करने में जुटे हुए हैं. बावजूद आज भी इस अदभुत विद्यालय में एक भी बेटी का दाखिला नहीं हो सका है.

​इस मामले इस पूरे मामले में डीआईओएस बस्ती संजय सिंह ने बताया कि मामले को संज्ञान में लेते हुए कहा यह अत्यंत गंभीर मामला है. हमने तत्काल विद्यालय के खिलाफ नोटिस जारी कर उनसे स्पष्टीकरण मांगा है. जांच के लिए विशेष अधिकारी तैनात किया गया है. यदि भेदभाव की पुष्टि होती है, तो कॉलेज की मान्यता रद्द करने से लेकर प्रबंधन पर कानूनी कार्रवाई तक की जाएगी.

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