मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच ईरान ने अपनी रणनीति में अहम बदलाव किया है. तेहरान ने इराक में सक्रिय अपने समर्थित मिलिशिया गुटों पर तैनात फील्ड कमांडरों को छूट दे दी है. इसके तहत वे अब बिना केंद्रीय मंजूरी के भी किसी ऑपरेशन को अंजाम दे सकते हैं. एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, ये बदलाव युद्ध के दबाव के चलते किया गया है.
दरअसल, ईरान के समर्थन वाली कई मिलिशिया इराक के सरकारी ढांचे के भीतर ही काम करती हैं. उन्हें सरकारी बजट से फंडिंग भी मिलती है. इसी वजह से अमेरिका और अन्य देशों ने लगातार इसकी आलोचना की है. उनका कहना है कि इन मिलिशिया के हमलों का सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर पड़ा है. बगदाद इन्हें रोकने में नाकाम रहा है.
अमेरिका के बढ़ते दबाव के बावजूद इराक इन गुटों को काबू में करने के लिए संघर्ष कर रहा है. एक मिलिशिया अधिकारी ने बताया कि सबसे कट्टरपंथी गुट अब ईरानी सलाहकारों की निगरानी में एक विकेंद्रीकृत कमांड ढांचे के तहत काम कर रहे हैं. एक अधिकारी ने कहा, ”हमें अधिकार दिया गया है कि केंद्रीय कमांड से पूछे बिना कार्रवाई कर सकते हैं.”
वाशिंगटन और मिलिशिया गुटों के बीच चल रहा समानांतर टकराव हालात को गंभीर बना रहा है. ये गुट ईरान के क्षेत्रीय अभियान का हिस्सा माने जाते हैं और अप्रैल में हुए सीजफायर से पहले इन्होंने इराक में अमेरिकी ठिकानों पर लगातार हमले किए थे. विशेषज्ञों का मानना है कि सीजफायर के बीच अमेरिका इन गुटों पर हमले तेज कर सकता है.
खासकर तब, जब इन मिलिशिया को ज्यादा स्वतंत्रता मिल चुकी है. शुक्रवार को अमेरिका ने ईरान समर्थित चार कट्टरपंथी इराकी मिलिशिया गुटों के सात कमांडरों और वरिष्ठ सदस्यों पर प्रतिबंध भी लगा दिए. हॉराइजन एंगेज के रिसर्च चीफ और वाशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर नियर ईस्ट पॉलिसी के सहायक फेलो माइकल नाइट ने अमेरिकी राय जाहिर की है.
उन दोनों ने कहा, ”अमेरिका को अब भी यही लगेगा कि उसके पास इराकी मिलिशिया पर हमला करने की पूरी आजादी है. यह स्थिति आगे चलकर एक ऐसे प्रयास में बदल सकती है, जिसका मकसद इराक में ऐसी सरकार बनवाने में मदद करना हो, जहां मिलिशिया का प्रभाव कम हो.” फिलहाल, मिलिशिया को मिली छूट मुसीबत बन सकती है.
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