मुर्शिदाबाद के मुसलमानों के दिल में कौन? 22 सीटों के वोटिंग पैटर्न से तय होगा बंगाल का सियासी भविष्य – West Bengal Muslim dominated districts Murshidabad voting pattern mamata vs humayun ntcpkb


पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक कहावत है कि “दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है,और कोलकाता का रास्ता मुर्शिदाबाद से. 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए मुर्शिदाबाद की 22 सीटें मुस्लिम वोट बैंक के नजरिए से सत्ता की चाबी बन गई हैं. इस इलाके की वोटिंग पैटर्न से वेस्ट बंगाल में मुस्लिम सियासत का भी फैसला होना है, जिसके चलते ही सही की निगाहें मुर्शिदाबाद की सीटों पर लगी हुई हैं.

बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण की 152 सीटों पर वोटिंग जारी है. इस फेज में सभी की निगाहें मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद पर लगी है, जहां पर कुल 20 विधानसभा सीटें है, जिन पर 220 उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं, जिनके सियासी भविष्य का फैसला  5,026,213 वोटर फैसला करेंगे. इनमें 2,588,764 पुरुष, 2,437,374 महिलाएं और 75 वोटर तीसरे लिंग (थर्ड जेंडर) के तौर पर रजिस्टर्ड हैं.

मुर्शिदाबाद जिले में 22 विधानसभा सीटें हैं, जहां पर लगभग 66 फीसदी से 67.7 फीसदी मुस्लिम आबादी है. इन सीटों को पारंपरिक रूप से टीएमसी का गढ़ माना जाता है, लेकिन बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान कर सुर्खियों में आए हुमायूं कबीर ने मुस्लिम वोटों के सहारे अपनी राजनीति चमकाने के लिए उतरे हैं. ऐसे में मुसलमानों का दिल कौन जीतेगा?

मुर्शिदाबाद में मुस्लिम वोटर  निर्णायक
बंगाल का मुर्शिदाबाद का इलाका मुस्लिम बहुल ही नहीं बल्कि यहां की राजनीति की दशा और दिशा भी मुस्लिम तय करते हैं. पिछले चुनाव में जिले की 22 सीटों से टीएमसी ने 20 सीटों जीती थी. 2026 के चुनावों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत 4 लाख से अधिक नाम कटे हैं, जिसके चलते यहां के चुनाव पर भी सियासी असर पड़ सकता है.

मुर्शिदाबाद की 22 सीटों में से 17 पर मुस्लिम आबादी का वर्चस्व है,जिससे यह जिला बंगाल राजनीति में ‘किंगमेकर’ बनता है. मुर्शिदाबाद, सागरदिघी, रानीनगर, जंगीपुर और फरक्का सीटें कांटे की टक्कर वाली मानी जा रही हैं. कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का गढ़ रहा है तो हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद के बहाने मुर्शिदाबाद में मुस्लिमों के सबसे बड़े नेता बनने की जुगत में है. इसीलिए मुर्शिदाबाद का वोटिंग पैटर्न बहुत कुछ तय करने वाला है.

मुर्शिदाबाद मुस्लिम सियासत की प्रयोगशाला
मुर्शिदाबाद मुस्लिम राजनीति की प्रयोगशाला कहा जाता है, ममता बनर्जी के लिए मुर्शिदाबाद उनके ‘अजेय’ होने का प्रमाण है. 2021 में टीएमसी ने 20 सीटें जीतकर कांग्रेस और वामपंथ के पुराने गढ़ को ध्वस्त कर दिया था, 2026 में सत्ता में वापसी के लिए टीएमसी को इन 22 सीटों पर क्लीन स्वीप की जरूरत है, लेकिन एसआईआर के चलते पार्टी को डर है कि यह उसके पारंपरिक वोट आधार में सेंध लगा सकता है.पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी ISF युवा मुस्लिम मतदाताओं के बीच पैठ बना रही है. अगर वे कुछ हजार वोट भी काटते हैं, तो इसका सीधा नुकसान टीएमसी को और फायदा विपक्ष को होगा.

मुर्शिदाबाद कभी अधीर रंजन चौधरी और कांग्रेस का अभेद्य किला हुआ करता था.कांग्रेस के लिए मुर्शिदाबाद अपने खोए हुए सियासी वजूद को पाने का आखिरी मौका माना जा रहा है, मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा तबका आज भी पुराने कांग्रेसी वफादारों से जुड़ा है. ऐसे ही ध्रुवीकरण और ‘वोट विभाजन’ बीजेपी के लिए मुर्शिदाबाद जिले की जमीन कठिन है, लेकिन रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है. बीजेपी की नजर उन सीटों पर है जहां मुस्लिम वोटों का त्रिकोणीय विभाजन में उसे अपनी उम्मीद दिख रही है.

मुर्शिदाबाद की हाई प्रोफाइल मुकाबला
पश्चिम बंगाल में कई धुरंधर मुर्शिदाबाद की सीटों पर किस्मत आजमा रहे हैं, जिनके लिए आज अग्निपरीक्षा है. बहरामपुर में, कांग्रेस ने अनुभवी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अधीर रंजन चौधरी को मैदान में है, वे पांच बार सांसद रह चुके हैं, लेकिन 2024 में लोकसभा सीट हार गए थे. इस मुकाबले को उनके पारंपरिक गढ़ में उनके लगातार बने प्रभाव की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है.

नाओदा और रेजीनगर में आम जनता उन्नयन पार्टी के हुमायूं कबीर चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे जिले में होने वाले अहम मुकाबलों की सूची में एक और नाम जुड़ गया है. सभी 22 सीटों पर बहुकोणीय मुकाबले देखने को मिल रहे हैं, जिनमें तृणमूल कांग्रेस, BJP, कांग्रेस-वाम गठबंधन और क्षेत्रीय दल शामिल हैं. लेफ्ट भी पूरी ताकत लगा रहा है, जिसके चलते रोचक मुकाबला हो गया है.

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