2 सितंबर, 1901 को संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति बनने से ठीक दो हफ्ते पहले, थियोडोर रूजवेल्ट ने अपना विदेश नीति मंत्र पेश किया था- “शालीनता से बोलें और साथ में एक बड़ी लाठी रखें आप बहुत आगे जाएंगे.”
“यदि कोई व्यक्ति लगातार शेखी बघारता है, उसमें शिष्टाचार की कमी है, तो एक बड़ी लाठी भी उसे मुसीबत से नहीं बचा पाएगी और न ही नरमी से बात करना तब काम आएगा, जब उस नरमी के पीछे ताक़त और शक्ति न हो.”
अपने दो कार्यकाल के दौरान, रूज़वेल्ट ने बिना किसी शेखीबाज़ी के मोनरो सिद्धांत को लागू करने के लिए अमेरिका की सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया.
ईरान संघर्ष के दौरान डोनाल्ड ट्रंप का आचरण बताता है कि वह इसके बिल्कुल विपरीत कर रहे हैं, उन्होंने केवल ऊंची आवाज में बात की है और उनकी ‘लाठी’ शक्तिशाली अमेरिकी सेना अब तक ईरान को वश में करने में विफल रही है.
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जीत का दावा करते हैं ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति ने बार-बार यह दावा किया है कि वह युद्ध जीत चुके हैं और ईरान समझौते के लिए गिड़गिड़ा रहा है. लेकिन हकीकत यह है कि ईरान वाशिंगटन के साथ आगे की बातचीत के लिए भी तैयार नहीं है. मंगलवार को उनके द्वारा एकतरफा युद्धविराम बढ़ाने की घोषणा को इस सबूत के तौर पर देखा जा रहा है कि वह एक बार फिर पीछे हट गए हैं, जिससे तेहरान के हौसले और बुलंद हुए हैं.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह संघर्ष जल्द ही समाप्त होने वाला है. बल्कि यह और भी खतरनाक मोड़ लेता दिख रहा है, जैसा कि बुधवार को होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में ईरान द्वारा दो जहाजों को जब्त किए जाने से स्पष्ट हुआ. यह घटना अमेरिका द्वारा इसी जलडमरूमध्य में एक ईरानी मालवाहक जहाज को जब्त करने के दो दिन बाद हुई है. ईरानी संसद के सदस्य और विधायिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति समिति के प्रवक्ता इब्राहिम रजाई ने कहा, “आंख के बदले आंख, और टैंकर के बदले टैंकर.”
रज़ाई शायद तेहरान के आधिकारिक रुख का प्रतिनिधित्व न करते हों, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की बातचीत के बाद से ईरान का रुख कड़ा हुआ है. शासन के वे सदस्य भी, जो पहले बातचीत के पक्ष में थे, अब समझौता न करने वाले बयान दे रहे हैं.
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पाकिस्तान के वास्तविक नेता और ट्रंप के पसंदीदा फील्ड मार्शल, आसिम मुनीर, ईरान को दूसरे दौर की बातचीत के लिए इस्लामाबाद आने के लिए मनाने में विफल रहे, बावजूद इसके कि उन्होंने पिछले सप्ताह तेहरान में तीन दिन बिताए और घर लौटने के बाद भी उन प्रयासों को जारी रखा. ट्रंप ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुश्नर को बातचीत के लिए पाकिस्तान जाने वाली उड़ान पर सवार होने के लिए तैयार रखा था, लेकिन ईरान के कट्टरपंथियों ने वार्ताकारों को शामिल होने से रोक दिया.
आर्थिक युद्ध
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की ट्रंप द्वारा की गई जवाबी नाकेबंदी, आगामी बातचीत की राह में सबसे बड़ी बाधा बनती दिख रही है. वर्तमान स्थिति यह है कि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर संघर्ष-विराम के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं. इस बीच, ईरान द्वारा इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को बंद किया जाना एक बेहद असरदार ‘आर्थिक हथियार’ साबित हुआ है.
इसी तरह, अमेरिका की नाकेबंदी का उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था का गला घोंटना है, ताकि उसके महत्वपूर्ण आयात और निर्यात को रोका जा सके, जिसका 90 प्रतिशत हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. इस ‘जैसे को तैसा’ वाली नाकेबंदी ने विश्व अर्थव्यवस्था का दम घोंट दिया है, जिसके दूरगामी परिणाम सामने आ रहे हैं.
होर्मुज की नाकेबंदी ने दशकों के किसी भी अन्य संकट की तुलना में तेल की आपूर्ति को सबसे अधिक बाधित किया है. लगभग एक अरब बैरल तेल का नुकसान पहले ही हो चुका है. लेकिन अगर यह संघर्ष कुछ और हफ्तों तक जारी रहा, तो स्थिति और भी बदतर हो जाएगी.
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विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर जलडमरूमध्य को जल्द ही पूरी तरह से नहीं खोला गया, तो इस साल तेल की कीमतें औसतन $130 प्रति बैरल रहेंगी. यह भारत जैसे देशों के लिए विनाशकारी होगा, जो काफी हद तक तेल आयात पर निर्भर हैं. इससे अमेरिका में भी गैस की कीमतें बढ़ेंगी, जिसका खामियाजा रिपब्लिकन पार्टी को नवंबर में होने वाले सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के चुनावों में भुगतना पड़ सकता है.
लेकिन कच्चे तेल की कीमतें ही एकमात्र समस्या नहीं हैं. बुधवार को जर्मन एयरलाइन लुफ्थांसा (Lufthansa) ने घोषणा की कि वह जेट ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण अगले छह महीनों में 20,000 उड़ानें कम कर रही है. प्लेट्स जेट फ्यूल प्राइस इंडेक्स के अनुसार, युद्ध की शुरुआत के बाद से जेट ईंधन की वैश्विक कीमतों में 70 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है.
अन्य यूरोपीय एयरलाइनों ने भी इसी तरह के कदमों की चेतावनी दी है. उर्वरक की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतें भी बढ़ने वाली हैं. इसके अलावा, रिफाइंड पेट्रोलियम, सल्फर और हीलियम की आपूर्ति पर भी बुरा असर पड़ा है.
परमाणु खतरा
इस्लामाबाद में जब पहले दौर की बातचीत बेनतीजा रही, तो वैंस ने साफ किया कि असली पेंच परमाणु मुद्दे पर फंसा है. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने पास मौजूद करीब 450 किलो संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) को हटा दे और आगे कभी भी यूरेनियम तैयार न करने का वादा करे. लेकिन ईरान की मौजूदा सरकार फिलहाल इस बात को मानने के मूड में बिलकुल नहीं दिख रही है.
ट्रंप ने इस उम्मीद में ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था कि वह वेनेजुएला जैसी अपनी उपलब्धि दोहरा सकेंगे और जल्द ही उन्हें वहां कोई ‘डेल्सी रोड्रिग्ज’ (समझौतावादी चेहरा) मिल जाएगा, लेकिन उनके इस फैसले का नतीजा ईरान को एक और उत्तर कोरिया बनाने के रूप में निकल सकता है, जहां शासन किसी लचीले रोड्रिग्ज के हाथ में नहीं, बल्कि ‘किम जोंग-उन’ जैसे किसी कट्टर नेता के हाथ में होगा.
यह स्थिति इजरायल के लिए एक बुरा सपना साबित होगी. ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) का एक धड़ा परमाणु मुद्दे पर किसी भी तरह के समझौते के सख्त खिलाफ है, क्योंकि वे परमाणु हथियार को इजरायल और अमेरिका के किसी भी भविष्य के हमले के खिलाफ एक वास्तविक ‘बीमा पॉलिसी’ के रूप में देखते हैं.
इजरायल और ट्रंप प्रशासन के दावों के बावजूद, मारे गए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के नेतृत्व में ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के पक्ष में नहीं था. उन्होंने अपने देश को ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) में शामिल होने के लिए भी कहा था.
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ईरान को नहीं ट्रंप पर भरोसा
हालांकि, वर्तमान ईरानी शासन के कट्टरपंथियों ने पहले ही उस संधि को छोड़ने की बात शुरू कर दी है. वहीं, कुछ अन्य लोग अभी भी परमाणु मुद्दे को संयुक्त राज्य अमेरिका से रियायतें हासिल करने के लिए एक ‘सौदेबाजी के हथियार’ के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं.
ईरान को अमेरिका और खासतौर पर ट्रंप पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है. अमेरिका के साथ दूसरे दौर की बातचीत के लिए तैयार न होने के पीछे ईरान का एक तर्क यह भी है कि ट्रंप सिर्फ समय काटने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वह दोबारा युद्ध शुरू कर सकें.
इस संघर्ष का नतीजा इस बात पर टिका है कि कौन सा पक्ष अधिक दर्द सहने की क्षमता रखता है. ईरान अच्छी तरह जानता है कि राजनीतिक और आर्थिक कारणों से ट्रंप एक समझौते के लिए कितने बेताब हैं. साथ ही, ईरान यह धारणा बनाने में भी कामयाब रहा है कि वह यह युद्ध जीत चुका है और उसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य मशीनरी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है.
लेकिन ईरान के हुक्मरानों को यह भी समझना होगा कि इस युद्ध ने उनके देश को गहरी चोट पहुंचाई है. ईरानी मुद्रा की कीमत औंधे मुंह गिर चुकी है. युद्ध से पहले ही भोजन की कमी और बढ़ती कीमतों की वजह से वहां की सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. अब होर्मुज जलडमरूमध्य की अमेरिकी नाकेबंदी से खाने-पीने की चीज़ों और अन्य जरूरी सामानों के आयात पर भी ब्रेक लग जाएगा, जिससे मुश्किलें और बढ़ेंगी.
नाकेबंदी का उद्देश्य ईरान के तेल और गैस निर्यात को रोकना है, जो उसकी जीडीपी का एक-चौथाई और निर्यात आय का 80 प्रतिशत हिस्सा है. ईरान के पास तेल भंडारण की क्षमता सीमित है, इसलिए अपने बुनियादी ढांचे को नुकसान से बचाने के लिए उसे उत्पादन रोकना ही होगा, लेकिन क्या इससे ईरान के कट्टरपंथी नेता झुकेंगे?
ट्रंप ईरान को बातचीत के लिए जवाबी प्रस्ताव तैयार करने और फैसला लेने के लिए केवल कुछ ही दिनों का समय दे रहे हैं, लेकिन ऐसे कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं कि राष्ट्रपति दोबारा युद्ध शुरू करना चाहते हैं, क्योंकि यह युद्ध पहले से ही अमेरिका में बेहद अलोकप्रिय हो चुका है.
तो, ट्रंप अब और क्या कर सकते हैं? अब तक, तनाव बढ़ाने की उनकी धमकियां खोखली साबित हुई हैं. उन्होंने खुद को ‘जी-हजूर’ करने वाले लोगों से घेर रखा है. उन्हें ईरान के किसी भी विशेषज्ञ से सलाह लेते नहीं देखा गया है. वह किसी विशेषज्ञ की सलाह से ज्यादा अपनी अंतरात्मा पर भरोसा करते हैं.
ईरान के कट्टरपंथियों और खुद ट्रंप के लापरवाह रवैये ने शायद उनके लिए एक त्वरित और सम्मानजनक निकास के सारे विकल्प खत्म कर दिए हैं. अब या तो ईरान उन्हें ऐसी रियायतें देने के लिए मजबूर कर देगा जो उनके राजनीतिक भविष्य के लिए घातक साबित हो सकती हैं और दुनिया में अमेरिका की साख को और कम कर देंगी. या फिर, उन्हें मजबूरन तनाव और बढ़ाना पड़ेगा, जो अमेरिका को एक और लंबी विदेशी जंग में धकेल सकता है, जबकि वह इसी के खिलाफ चुनाव प्रचार करके सत्ता में आए थे.
(नरेश कौशिक BBC और एसोसिएटेड प्रेस के पूर्व संपादक हैं, वे लंदन में रहते हैं.)
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