मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था के प्रमुख राफेल ग्रॉसी ने एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के लिए होने वाले किसी भी समझौते में ईरान की परमाणु गतिविधियों की बहुत विस्तृत और सख्त जांच अनिवार्य होनी चाहिए.

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के डायरेक्टर जनरल राफेल ग्रॉसी ने सियोल में पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह चिंता जताई है. उनका कहना था कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम बेहद व्यापक और महत्वाकांक्षी है. ऐसे में बिना ठोस निगरानी के कोई भी समझौता सिर्फ कागजों पर ही रह जाएगा.

राफेल ग्रॉसी ने कहा, ”यदि निरीक्षकों की मौजूदगी नहीं होगी, तो आपके पास समझौता नहीं, बल्कि सिर्फ समझौते का भ्रम होगा.” उनका ये बयान ऐसे समय में आया है जब ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ बातचीत का दूसरा दौर जल्द शुरू हो सकता है. हालांकि, अमेरिका इस मुद्दे पर अपनी स्थिति साफ कर चुका है.

अमेरिकी प्रशासन पहले ही बता चुका है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना उसकी रणनीति का अहम हिस्सा है. दूसरी तरफ ईरान लगातार दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. इसके बावजूद उसने किसी भी तरह की पाबंदी को स्वीकार करने से इनकार किया है.

इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच हुई बातचीत का पहला दौर भी बेनतीजा रहा. व्हाइट हाउस ने जहां ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को मुख्य बाधा बताया, वहीं तेहरान ने इस दावे को खारिज कर दिया. IAEA की एक गोपनीय रिपोर्ट ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिसमें ईरान ने परमाणु ठिकानों तक निरीक्षकों को जाने नहीं दिया.

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि प्रभावित स्थलों पर मौजूद यूरेनियम के भंडार का सही आकलन फिलहाल संभव नहीं है. IAEA के अनुसार, ईरान के पास इस समय 440.9 किलोग्राम यूरेनियम है, जिसे 60 प्रतिशत तक संवर्धित किया जा चुका है. यह स्तर हथियार बनाने के लिए जरूरी 90 फीसदी शुद्धता के करीब माना जाता है.

इससे पहले राफेल ग्रॉसी चेतावनी दे चुके हैं कि यदि ईरान चाहे तो यह भंडार उसे 10 तक परमाणु बम बनाने की क्षमता दे सकता है. यही वजह है कि IAEA ऐसे संवेदनशील परमाणु सामग्री की हर महीने जांच को जरूरी मानता है. ईरान का दावा भले ही शांतिपूर्ण उपयोग का हो, लेकिन पश्चिमी देशों का इससे इतर मानना है.

उनका कहना है कि साल 2003 तक तेहरान के पास परमाणु हथियार विकसित करने का संगठित कार्यक्रम मौजूद था. यही इतिहास आज की बातचीत को और ज्यादा जटिल बना रहा है. इस बीच, ग्रॉसी ने एक और अहम खुलासा किया. उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया में परमाणु गतिविधियों में तेजी देखी गई है.

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि साल 2019 में अमेरिका के साथ कूटनीतिक प्रयासों के विफल होने के बाद से उत्तर कोरिया ने अपने योंगब्योन परमाणु परिसर का विस्तार किया है और नए यूरेनियम संवर्धन केंद्र विकसित किए हैं. दक्षिण कोरिया के अनुसार, उत्तर कोरिया चार यूरेनियम संवर्धन सुविधाएं संचालित कर रहा है.

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