जब ईरान को समझते ही नहीं है राष्ट्रपति ट्रंप, तो कैसे कर पाएंगे पीस डील! – us president donald trump iran war Israel strait of hormuz china ceasefire ntcppl


बुधवार को पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर की तेहरान की अचानक यात्रा से इस बात की अटकलें तेज हो गई हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का दूसरा दौर जल्द ही शुरू होने वाला है. ऐसा लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पसंदीदा फील्ड मार्शल को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वे ईरान को युद्ध समाप्त करने के लिए एक रिवाइज डील पर बातचीत करने के लिए राजी करें. लेकिन दोनों में से किसी भी पक्ष के पीछे हटने को तैयार न होने से, ऐसे किसी समझौते के सफल होने की संभावना पर सवाल खड़े हो गए हैं.

ट्रंप का रास्ता गलत है

इस्लामाबाद में हाल ही में हुई शांति वार्ता दोनों पक्षों के बीच भरोसे की कमी के कारण नाकाम रही. ट्रंप को ऐसा लगता है कि सैन्य दबाव के जरिए ईरान को किसी समझौते के लिए राजी किया जा सकता है; भले ही 38 दिनों की लगातार बमबारी, अपनी सेना और नागरिक बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान और अपने टॉप लीडरशिप के मारे जाने के बावजूद ईरान जंग के मैदान में डटा रहा हो.

पिछले चार दशकों में अमेरिका के बाकी सभी राष्ट्रपतियों ने ईरान पर हमला करने के लिए इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की बार-बार की गई गुजारिशों को ठुकरा दिया था. उन्होंने ईरान मामलों के विशेषज्ञों की उस सलाह पर अमल किया जिसमें ऐसे किसी भी खतरनाक कदम के खिलाफ आगाह किया गया था.

लेकिन ऐसा लगता है कि ट्रंप ने सिर्फ़ बीबी की बात सुनी, जिन्होंने उन्हें यकीन दिलाया कि ईरान कुछ ही दिनों में ढह जाएगा और इससे अमेरिका को जल्दी जीत मिल जाएगी. उन्होंने अपने खाड़ी सहयोगियों, अपने फौजी कमांडरों और अपने उपराष्ट्रपति की सलाह को नजरअंदाज कर दिया. वह तो पिछले सालों में दिए अपने ही भाषण भी भूल गए, जब उन्होंने अमेरिका को किसी दूसरे देश के युद्ध में न ले जाने की दलील दी थी.

अपनी किताब, “War of Necessity, War of Choice: A Memoir of Two Iraq Wars” में अनुभवी अमेरिकी राजनयिक रिचर्ड हास यह तर्क देते हैं कि आपको किसी ऐसे देश के खिलाफ युद्ध नहीं करना चाहिए जिसे आप समझते ही न हों.

अगर उन्होंने ईरान के किसी विशेषज्ञ से सलाह ली होती, तो ट्रंप को ईरान के उस अनुभव के बारे में बताया जाता जिसमें उसने इराक के खिलाफ आठ साल तक युद्ध लड़ा था और इससे ट्रंप को वहां के इस्लामी शासन के स्वभाव के बारे में भी पता चलता जो पिछले पांच दशकों में अपने अस्तित्व को मिटाने की कई कोशिशों के बावजूद बचा रहा है. वह दशकों से इजराइल और अमेरिका के खिलाफ युद्ध लड़ने की तैयारी भी करता रहा है.

डील सील करने की कला

US के उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस जिन्होंने पिछले हफ़्ते इस्लामाबाद में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था, ने मंगलवार को कहा कि ट्रंप एक “बड़ी डील” करना चाहते हैं, जिसके तहत अगर ईरानी परमाणु हथियार न बनाने का वादा करते हैं तो उन्हें आर्थिक समृद्धि मिलेगी. यह बात फिर से दिखाती है कि उन्हें ईरान की समझ की कमी है.

ईरान जो चाहता है, वह है सम्मान . इसके अलावा ईरान चाहता है कि परमाणु मुद्दे पर समझौता हो और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के बदले में उसकी फ्रीज संपत्ति को रिलीज किया जाए और उससे प्रतिबंध हटाए जाएं. अमेरिका को यह समझने की ज़रूरत है कि जब से युद्ध शुरू हुआ है, तब से इस्लामी शासन ज़्यादा मज़बूत और अडियल हो गया है.  इसलिए अब इस बात की संभावना कम ही है कि ईरान कोई ऐसी डील स्वीकार करेगा, जिसे वह युद्ध से पहले स्वीकार कर लेता.

वेंस के अनुसार इस्लामाबाद में यूरेनियम एनरिचमेंट को लेकर असहमति ही मुख्य बाधा थी. US कम से कम 20 सालों तक “जीरो एनरिचमेंट” पर जोर दे रहा है, हालांकि ट्रंप ने कहा है कि वह नहीं चाहते कि ईरान अपनी जमीन पर कभी भी किसी भी तरह का संवर्धन करे.

2015 के अंतरराष्ट्रीय समझौते में जिसे ट्रंप ने 2018 में एकतरफा रूप से रद्द कर दिया था, जबकि ईरान उसकी शर्तों का पालन कर रहा था. ईरान को 15 सालों तक 3.6 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन करने की अनुमति दी गई थी. उसके बाद से ईरान ने संवर्धन का स्तर बढ़ाने का फ़ैसला किया. एनरिचमेंट का ये स्तर एक साल पहले 60 प्रतिशत तक पहुंच गया था.

इजरायल और लेबनान

ट्रंप को ईरान को यह भी भरोसा दिलाना होगा कि वह 7 अप्रैल को घोषित संघर्ष-विराम को लेकर गंभीर हैं. बातचीत के दूसरे दौर से पहले लेबनान में संघर्ष-विराम ईरान का भरोसा जीतने में काफी मददगार साबित होगा.

जब अमेरिका और ईरान पाकिस्तान में बातें कर रहे थे, तब इजरायल लेबनान पर बमबारी कर रहा था. ट्रंप को नेतन्याहू से इन हमलों को रोकने के लिए कहना चाहिए, पिछले छह हफ़्तों में इन हमलों में 2,100 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं, जिनमें से ज़्यादातर आम नागरिक थे.

ट्रंप द्वारा संघर्ष-विराम की घोषणा किए जाने के कुछ ही घंटों बाद नेतन्याहू ने लेबनान पर जोरदार बमबारी का आदेश दे दिया, जिसमें कुछ ही मिनटों के भीतर 300 से ज़्यादा लोग मारे गए. इस घटना के चलते ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया. अमेरिका के सहयोगी देशों ने इज़रायल से लेबनान में अपने सैन्य अभियान रोकने का आग्रह किया है, लेकिन नेतन्याहू ने उन अपीलों को नजरअंदाज़ कर दिया है. वह केवल ट्रंप की बात ही सुनेंगे.

पिछले हफ़्ते ट्रंप ने नेतन्याहू से हमलों को कम करने के लिए कहा था, लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ. नेतन्याहू और इजरायल में उनके करीबी सहयोगी शायद अकेले ऐसे लोग हैं जो चाहते हैं कि ईरान और लेबनान में संघर्ष जारी रहे. इज़रायल में उन पर अपने राजनीतिक फ़ायदों के लिए देश को लगातार युद्ध की स्थिति में रखने का आरोप लगाया गया है.

इज़रायलियों को सुरक्षा को लेकर सचमुच चिंताएं हैं. लेकिन उन्हें यह भी लगता है कि जंगों ने उन्हें ज़्यादा सुरक्षित नहीं बनाया है. वे अपने देश की बिगड़ती अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर भी चिंतित हैं, खासकर गाज़ा में हुए उस सैन्य अभियान के बाद जिसमें 72,000 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनियों की मौत हुई है.

पूरी दुनिया पर असर

ट्रंप ने नेतन्याहू के साथ मिलकर इस युद्ध में हिस्सा लिया लेकिन उन्होंने न तो इसके मकसद साफ़ तौर पर बताए और न ही इससे बाहर निकलने की कोई रणनीति सोची. उनके इस फैसले ने दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भारी तबाही मचा दी है. मंगलवार को IMF की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि इस युद्ध की वजह से महंगाई और बढ़ेगी और यहां तक कि मंदी भी आ सकती है. इसने अमेरिका की GDP के अनुमान को घटाकर 2.3 फ़ीसदी कर दिया है, जो सरकार के 3.5 फीसदी के अनुमान से काफी कम है. खाड़ी देशों को इससे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा.

लेकिन ईरान के साथ इस टकराव का सबसे बुरा असर ऊर्जा बाज़ार में गहराते संकट के रूप में सामने आया है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फ़तेह बिरोल ने चेतावनी दी है, “हर दिन हमें 1.3 करोड़ बैरल तेल का नुकसान हो रहा है, और कल यह नुकसान और भी बढ़ सकता है।”

यूरोप में एक बैरल तेल की कीमत 150 डॉलर तक पहुंच गई है. अमेरिका में एक गैलन पेट्रोल की औसत खुदरा कीमत अब 4.12 डॉलर हो गई है. युद्ध से पहले इसकी कीमत 3 डॉलर प्रति गैलन थी.

ट्रंप के लिए यह पहले ही एक राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. अगर वह ईरान के साथ कोई समझौता करके इस टकराव को खत्म नहीं कर पाते हैं, तो पेट्रोल की कीमतें और भी बढ़ जाएंगी. अगर ईरानी अपना कड़ा रुख अपनाते हैं और अमेरिका के मध्यावधि चुनावों तक इस टकराव को लंबा खींचते हैं, तो पेट्रोल की कीमतें मौजूदा स्तर से दोगुनी हो सकती हैं. ऐसा होने पर ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की हार लगभग तय है; कांग्रेस पर से उनका नियंत्रण खत्म हो जाएगा, और वह एक कमजोर राष्ट्रपति बनकर रह जाएंगे.

असली समस्या चीन है

ट्रंप इस युद्ध को जल्द से जल्द खत्म करना चाहते हैं. उन्होंने चीन की अपनी तय यात्रा को एक बार पहले ही टाल दिया है. उन्हें मई के मध्य में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलना है और उससे पहले उन्हें एक समझौता हो जाने की उम्मीद है. शी चाहते हैं कि होर्मुज स्ट्रेट फिर से खुल जाए, क्योंकि चीन की 40 प्रतिशत एनर्जी सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. उन्होंने तेहरान और वॉशिंगटन के बीच समझौता करवाने में मदद करने के लिए पाकिस्तान को अपनी मंज़ूरी दे दी है.

मंगलवार को शी ने ट्रंप का नाम लिए बिना उनकी आलोचना की, और इसे ‘जंगल का कानून’ कहा. वह होर्मुज स्ट्रेट पर नाकेबंदी लगाने के ट्रंप के फैसले से खुश नहीं हैं. इस बात का डर है कि अगर अमेरिकी नौसेना ने चीन के किसी टैंकर को निशाना बनाया तो चीन और अमेरिका के बीच टकराव हो सकता है. लेकिन बुधवार को ट्रंप ने दावा किया कि चीन उनसे “बहुत खुश” है, क्योंकि वह “होर्मुज़ स्ट्रेट को हमेशा के लिए खोल रहे हैं.” जैसा कि अक्सर होता है ट्रंप ने इस बारे में ज़्यादा विस्तार से कुछ नहीं बताया है.

अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों में हाल ही में कहा गया था कि चीन ईरान को हथियार भेज रहा है. तेहरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पिछले कई सालों से चीन से मिलने वाले उपकरणों से ही चल रहा है, लेकिन अमेरिकी रिपोर्टों में हाल ही में मिसाइलों की कुछ नई खेप पहुंचने का भी ज़िक्र किया गया है.

बीजिंग ने इन रिपोर्टों से इनकार किया और ट्रंप ने भी कहा कि चीन तेहरान को कोई भी हथियार न देने पर सहमत हो गया है. अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी होने के नाते बीजिंग इस बात से खुश होगा कि इस संघर्ष में ईरान का पलड़ा भारी रहे, क्योंकि इससे अमेरिका मध्य-पूर्व में ही उलझा रहेगा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से दूर रहेगा.

ये खुद को धोखा देना है

US और ईरान के बीच बातचीत के दूसरे राउंड का दुनिया के ज़्यादातर लोग स्वागत करेंगे. ट्रंप की बेचैनी से पता चलता है कि उन्हें एहसास हो गया है कि युद्ध के शुरुआती दिनों में जिसे उन्होंने “एक छोटा सा चक्कर” कहा था वह उनके और US के लिए बहुत महंगा साबित हुआ है.

लेकिन उन्हें ईरान को समझने और खुद को धोखा देने की आदत से जूझना होगा. जल्दबाजी में कोई समझौता करने के बजाय ट्रंप को अपनी टीम को ईरानी साथियों के साथ भरोसा बनाने के लिए समय देना चाहिए. 2015 के ईरान न्यूक्लियर डील पर साइन होने से पहले ओबामा एडमिनिस्ट्रेशन को लगभग दो साल की मेहनत और उबाऊ बातचीत करनी पड़ी थी.

ईरान के नेताओं को यह भी समझना चाहिए कि लड़ाई जारी रखने से उनकी तकलीफे कम नहीं होने वाली हैं. ईरान के मिलिट्री और सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर को बहुत नुकसान हुआ है और हज़ारों लोग मारे गए हैं. तेहरान और वाशिंगटन को यह साफ़ होना चाहिए कि अगर युद्ध खत्म होने के बजाय बढ़ता है तो उन्हें और भी ज़्यादा नुकसान होगा.

नरेश कौशिक बीबीसी और एसोसिएटेड प्रेस के पूर्व एडिटर हैं. वह लंदन में रहते हैं.

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