‘साइलेंट’ को ‘सॉलिड वोट बैंक’ बनाने के मोदी प्लान पर भारी पड़ रहा विपक्ष का ओबीसी दांव! – narendra modi women reservation opposition party congress obc issue bjp political challenge ntcpkb


देश की सियासत में ‘आधी आबादी’ को सियासी हक देने का मुद्दा अब एक ऐसे ‘शतरंज के खेल’में बदल चुका है, जहां हर चाल के पीछे गहरी सियासी चाल छिपी हुई है. एक तरफ केंद्र की मोदी सरकार ने संसद में’नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में नया संशोधन बिल लाकर 2029 में सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर ली है.

मोदी सरकार ने महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण को जमीन पर उतारने के लिए एक साथ तीन संशोधन विधेयक संसद में लेकर आई है. लोकसभा में गुरुवार से ही चर्चा चल रही है और शुक्रवार को वोटिंग होने वाली है. मोदी सरकार आधी आबादी को एक तिहाई हिस्सेदारी देकर महिलाओं को एक मजबूत वोटबैंक बनाने के लिए दांव चला है.

वहीं, दूसरी तरफ विपक्ष ने महिला आरक्षण संसोधन बिल में ‘ओबीसी कोटा’ का ऐसा पेंच फंसाया है, जो बीजेपी के लिए ‘गले की फांस’ बन सकता है. सरकार ने महिला आरक्षण में ओबीसी समुदाय के लिए कोटा फिक्स नहीं किया, जिसे विपक्ष के तमाम नेताओं उठाया. सपा प्रमुख अखिलेश यादव से लेकर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं को हिस्सेदारी देने की मांग रखी, जो बीजेपी के लिए सियासी तौर पर कहीं महंगा न पड़ा जाए?

‘साइलेंट’ को ‘सॉलिड वोट बैंक’ बनाने का प्लान
मोदी सरकार ने महिला आरक्षण के जरिए आधी आबादी को साधने का दांव चला है, जिसे 2029 के लोकसभा में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व करने की है. इसके लिए सरकार ने 2023 में ही नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया था, लेकिन उसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू किया जाना था. महिला आरक्षण में हो रही देरी के चलते मोदी सरकार ने अब उसे संशोधन कर फौरन लागू करने के मकसद से ही तीन विधेयक लेकर आई है, जिसमें एक महिला आरक्षण और दूसरा परिसीमन से जुड़ा हुआ है.

16 अप्रैल, 2026 को सरकार ने अचानक महिला आरक्षण अधिनियम की अधिसूचना जारी कर सबको चौंका दिया. इतना ही नहीं संसद में संशोधन बिल लाना यह साफ करता है कि बीजेपी अब इस मुद्दे को और लटकाने के मूड में नहीं है. सरकार का संदेश साफ है ‘हम जो कहते हैं, उसके करते हैं.’ बीजेपी की सोची-समझी रणनीति के तहत महिलाओं को एक ‘साइलेंट वोटर’ से बदलकर एक ‘सॉलिड वोट बैंक’ में तब्दील करने की है.

पीएम मोदी ने कहा कि महिला आरक्षण 25-30 साल पहले ही लागू हो जाना चाहिए था, लेकिन अब यह अवसर मिला है तो इसे गंवाना नहीं चाहिए. आज जो इस बिल का विरोध करेंगे, उन्हें लंबे समय तक इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. पिछले 30 वर्षों के इतिहास से सबक लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि पहले भी जिन्होंने महिला आरक्षण का विरोध किया, उन्हें चुनावों में महिलाओं ने माफ नहीं किया.

प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर इस बार भी महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाया, तो देश की माताओं और बहनों को जवाब देना मुश्किल होगा, इसलिए सभी सांसदों को इस ऐतिहासिक अवसर को नहीं गंवाना चाहिए. बीजेपी को उम्मीद है कि 2029 के चुनावों में 33 फीसदी आरक्षण का सियासी लाभ मिल सकता है, क्योंकि महिलाएं देश की राजनीतिक दशा और दिशा तय कर रही हैं.

राहुल0प्रियंका गांधी ने चला ओबीसी का दांव
महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर लोकसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाई.उन्होंने कहा कि इसमें एससी-एसटी और ओबीसी महिलाओं को भी आरक्षण सुनिश्चित कर दिया जाए तो  महिला आरक्षण आज ही पारित हो सकता है. सात ही जातीय जनगणना का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जब तक जनगणना नहीं हो जाती है, सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल सकता.

प्रियंका ने कहा कि 2011 के हिसाब से महिला आरक्षण दे रहे हैं, जिसमें  ओबीसी की संख्या नहीं है. बीजेपी ओबीसी के हक को छीनना चाहती है, लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं होने देगी.  एससी, एसटी,ओबीसी के लिए उप-कोटा के साथ महिला आरक्षण लागू किया जाए. ओबीसी को लेकर कांग्रेस के स्टैंड में बड़ा बदलाव दिख रहा है. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस महिला आरक्षण को ‘अधूरा’ करार दिया है. विपक्ष का तर्क सीधा है कि बिना ओबीसी आरक्षण के, यह कानून सिर्फ उच्च वर्ग की महिलाओं तक सीमित रह जाएगा.

विपक्षी दलों ने सेट किया ओबीसी का नैरेटिव
महिला आरक्षण की राह में तीन दशक बाधा बन रहे सियासी दलों का मूड भी वक्त के साथ बदल गया है,लेकिन अभी भी अपने स्टैंड कायम हैं.सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि महिला आरक्षण लैंगिक न्याय और सामाजिक न्याय का संतुलन होना चाहिए. इसमें पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी (PDA) की महिलाओं का आरक्षण निश्चित प्रतिशत रूप में स्पष्ट होना चाहिए.

सपा सांसद डिंपल यादव ने ओबीसी की मांग उठाई. महिला आरक्षण बिल पर हमारी हमेशा मांग रही है ओबीसी महिलाएं, उच्च जाति की पढ़ी-लिखी महिलाओं का सही तरीके से मुकाबला नहीं कर सकतीं. इसलिए उनके लिए कोटे के अंदर कोटा होना चाहिए. सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी महिला आरक्षण का मुद्दा उठाते हुए ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के आरक्षण की मांग उठाई.

आरजेडी ने भी कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए महिला आरक्षण विधेयक में एससी, एसटी और ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा प्रदान किया जाना चाहिए था. लेकिन, मोदी सरकार ने एससी, एसटी और ओबीसी के साथ धोखा किया है. बसपा प्रमुख मायावती ने महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए एससी-एसटी समुदाय की महिलाओं को अतरिक्त आरक्षण दिया जाए.महिला आरक्षण में ओबीसी कोटा भी होना चाहिए,अगर ऐसा नहीं हुआ तो इन वर्गों के साथ नाइंसाफी होगी.

बीजेपी के लिए गले ही फांस न बना जाए

विपक्ष के इस ‘ ओबीसी कार्ड’ से बीजेपी को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश की है. विपक्ष जानता है कि भारत की कुल आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है. ऐसे में ‘कोटा के भीतर कोटा’ की मांग करके विपक्ष ने पिछड़ों और अति-पिछड़ों के बीच यह संदेश भेजने की कोशिश की है कि बीजेपी उनका हक छीन रही है. महिला आरक्षण बिल पिछले तीन दशकों से इसीलिए लटका हुआ था, क्योंकि ओबीसी समुदाय के लिए आरक्षण दिया नहीं जा रहा था.

बीजेपी के राजनीतिक उभार के पीछे ओबीसी समुदाय के मतदताओं की अहम भूमिका रही है. बीजेपी ने पीएम मोदी को ओबीसी चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है, जिसका सियासी फायदा भी पार्टी को मिल है. मंडल कमीशन लागू किए जाने बाद देश की सियासत पूरी तरह से बदल गई है और ओबीसी के इर्द-गिर्द पूरी राजनीति सिमट गई है. पिछड़ा वर्ग राजनैतिक धुरी बने हुए हैं.

बीजेपी 2014 में नरेंद्र मोदी के अगुवाई सत्ता में आई तो उसमें ओबीसी समुदाय की अहम भूमिका रही थी. ऐसे में महिला आरक्षण में ओबीसी समुदाय के लिए कोटा फिक्स न किए जाने का एजेंडा विपक्ष जिस तरह से उठाया है,उससे बीजेपी को निपटना आसान नहीं है. महिला आरक्षण पर इसीलिए सवाल उठाते रहे हैं कि इसका फायदा कुछ विशेष वर्ग तक सीमित रह जाएगा.

देश की बदली सियासत में ओबीसी अहम

देश की दलित, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में कमी हो सकती है. इन नेताओं की मांग है कि महिला आरक्षण के भीतर ही दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाए. ओबीसी समुदाय के वोटों को साधने के लिए कांग्रेस पार्टी भी कोशिशों में जुटी है. ग्रेस ने जिस तरह से महिला आरक्षण में कोटे के अंदर कोटे की मांग की है, उससे बीजेपी के लिए पार पाना आसान नहीं है?

राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में विपक्ष ने इस महिला आरक्षण को ‘अधूरा’ करार दिया है. विपक्ष का तर्क सीधा हैबिना ओबीसी आरक्षण के, यह कानून सिर्फ उच्च वर्ग की महिलाओं तक सीमित रह जाएगा. विपक्ष ने ‘कोटा के भीतर कोटा’ की मांग करके विपक्ष ने पिछड़ों और अति-पिछड़ों के बीच यह संदेश भेजने की कोशिश की है कि बीजेपी उनका हक छीन रही है और हम आपके लिए लड़ रहे हैं.

एक तरफ कुंआ तो दूसरी तरफ खाईं
बीजेपी के लिए यह स्थिति ‘इधर कुआं, उधर खाई’ जैसी है. बीजेपी की पिछले एक दशक की जीत का बड़ा आधार ‘गैर-यादव ओबीसी’ वोट रहा है. यदि बीजेपी विपक्ष की मांग मानती है, तो उसे अपने सवर्ण वोट बैंक की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है यदि नहीं मानती, तो विपक्ष उसे ‘ओबीसी विरोधी’ घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा.

आरक्षण की इस बहस ने एक बार फिर ‘जातीय जनगणना’ की मांग को हवा दे दी है। अधिसूचना में परिसीमन की शर्त जुड़ी है, और परिसीमन बिना सटीक आंकड़ों के संभव नहीं. विपक्ष का कहना है कि जब सरकार परिसीमन कर ही रही है, तो जातीय जनगणना से क्यों भाग रही है?

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