हमारे देश में वैसे तो ना जाने ऐसे कितने ही मामले हैं, जिन्हें सीबीआई ने ‘कत्ल’ कर दिया. लेकिन बिहार के पटना में जिस तरह से नीट (NEET) छात्रा के केस को सीबीआई ने मारा है, इसके बाद ये अफवाह जोर पकड़ रही है कि सीबीआई किसी ताकतवर को शख्स को बचाने की कोशिश कर रही है. सीबीआई की लापरवाही का आलम ये है कि तय 90 दिनों के अंदर वो अदालत में चार्जशीट दाखिल करना ही भूल गई. जिसकी वजह से गर्ल्स हॉस्टल का आरोपी मालिक जमानत का हकदार हो गया.

बस यूं समझ लीजिए कि अब कोई करिश्मा ही पटना की नीट छात्रा की मौत का रहस्य उजागर कर सकता है. वरना पटना पुलिस से लेकर देश की सबसे नामचीन जांच एजेंसी सीबीआई ने जांच के नाम पर इस केस का जो हश्र किया है उसकी दूसरी मिसाल पूरे देश में नहीं मिलेगी. क्या आपने कभी किस्से कहानियों में भी सुना है कि किसी लड़की का रेप होता है, फिर उसकी मौत होती है और उस मौत के बाद सीबीआई भूल जाती है कि नाबालिग मौत और रेप के मामले में उसे पॉक्सो की धारा लगानी है. सीबीआई भूल जाती है कि जिस गर्ल्स हॉस्टल में नीट छात्रा बेहोश मिली थी, उस हॉस्टल में उस रात एक्टिव मोबाइल के कॉल डिटेल भी खंगालने हैं.

सीबीआई भूल जाती है कि कुंआ छात्रा के अंडर गारमेंट से जो स्पर्म मिले, उसका आरोपियों के साथ मिलान भी कराना है. सीबीआई भूल जाती है कि नीट छात्रा की फॉरेंसिक रिपोर्ट जो दिल्ली के एम्स में पड़ी है, उसे मंगा कर उसे पढ़ना भी है. सीबीआई भूल जाती है कि इस पूरे केस में जो इकलौती गिरफ्तारी हुई, गर्ल्स हॉस्टल के उस मालिक मनीष रंजन से पूछताछ भी करनी है. हद तो ये है कि सीबीआई ये तक भूल जाती है कि इस मामले में 90 दिन के अंदर अदालत में उसे चार्जशीट यानी आरोप पत्र दाखिल करना. लिहाजा, भुलक्कड़ सीबीआई की इस सबसे बड़ी भूल का अंजाम ये है कि गर्ल्स हॉस्टल का मालिक मनीष रंजन अपने-आप जमानत पाने का हकदार हो जाता है और बड़ी आसानी से जेल से बाहर भी आ जाता है.

इस एक केस में की गई गलतियों की ये तमाम गलतियां शायद ना इत्तेफाक है, ना गलती, ना लापरवाही और ना ही इतनी बड़ी जांच एजेंसी का नौसिखियापन. तो फिर आप पूछेंगे कि भला सीबीआई खुद इस बेशर्मी के साथ अपनी भद्द क्यों पिटवाएगी? तो आपके इसी सवाल में ही तो वो सवाल है कि आख़िर नीट छात्रा के रेपिस्ट या क़ातिल को कौन, क्यों और किस लिए बचाने की कोशिश कर रहा है. वो कौन है जो इतना ताकतवर है कि पटना पुलिस से लेकर सीबीआई की पांच अलग-अलग टीमों के हाथों से जांच गुजर गई, पर क्या मजाल जो कोई भी टीम या जांच अधिकारी सच के करीब जाने की हिम्मत दिखा पाता.

पहले दिन से लेकर अब तक और पटना पुलिस से लेकर सीबीआई तक इस केस में हर पल हर मोड़ पर इतनी गलतियां की गई हैं कि अब सचमुच पटना में सत्ता के गलियारों में जो चर्चा आम है उस पर यकीन होने लगा है. चर्चा ये कि ये केस कभी इसलिए नहीं खुल पाएगा क्योंकि इसके पीछे सत्ता के करीबी एक बड़े और ताकतवर शख्स का नाम है. सीबीआई अपनी बचकानी जांच की हरकतों से इन चर्चाओं पर हकीकत की मुहर लगाने में जुटी है.

बिहार की राजधानी पटना में मौजूद है शंभू गर्ल्स हॉस्टल है. ये वही हॉस्टल है, जहां 6 जनवरी को नाबालिग नीट छात्रा बेहोशी की हालत में मिली थी. फिर तीन-तीन अस्पताल में उसका इलाज चला और आखिरकार 11 जनवरी को उसने दम तोड़ दिया. और मनीष रंजन उसी शंभू गर्ल्स हॉस्टल का मालिक है, जिसे पटना पुलिस ने शुरुआत में ही गिरफ्तार कर लिया था. तब से मनीष रंजन पटना के बेऊर जेल में बंद था. इस दौरान उसने जमानत पाने की तमाम कोशिश की. लेकिन अदालत ने उसे जमानत देने से इनकार कर दिया.

पर अब इस केस में गिरफ्तार इकलौता मनीष रंजन भी जमानत पर रिहा हो गया है. जानते हैं कैसे? अदालत ने मनीष रंजन को जमानत नहीं दी, बल्कि जिस जांच एजेंसी सीबीआई को पुख्ताा सबूतों के साथ उसे जेल की सलाखों के पीछे रखना की जिम्मेदारी थी, उसी सीबीआई की जाने-अनजाने मिली कृपा से मनीष रंजन आजाद हो गया. मनीष रंजन को जमानत पाने के लिए अदालत में बहस तक नहीं करनी पड़ी. क्योंकि सीबीआई ने उसकी नौबत ही नहीं आने दी. लिहाजा, डिफॉल्ट बेल की कृपा के सहारे मनीष छूट गया.

पुलिस में भर्ती होने वाला नौसिखिया पुलिस अफसर भी इतना तो जानता है कि हर केस में 90 दिन के अंदर-अंदर उस केस से जुड़ी चार्जशीट यानी आरोप पत्र अदालत में दाखिल करनी होती है. इसी चार्जशीट की बुनियाद पर आरोपी या आरोपियों के खिलाफ आरोप तय होते हैं. फिर उन पर उन्हीं आरोपों से जुड़ी धाराओं में मुकदमा चलता है. इसी चार्जशीट के आधार पर फिर मुकदमे का फैसला होता है. अब अगर 90 दिन के इस तय मियाद में देश की कोई भी जांच एंजेसी चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाती, तो इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि जिस आरोपी को जांच एजेंसी ने पहले से ही पकड़ कर जेल में डाला हुआ है उसके खिलाफ कोई आरोप ही नहीं है. अब जब आरोपी के खिलाफ आरोप ही नहीं है, तो फिर उसे जेल में कैसे रख सकते हैं?

इसीलिए कानून कहता है कि जांच एजेंसी को 90 दिन के अंदर चार्जशीट दाखिल करनी ही करनी है. अब सोचिए, एक पूरा केस जिस एक चार्जशीट पर खड़ा होता है, वही चार्जशीट नीट छात्रा के केस में सीबीआई तय मियाद यानी 90 दिन के अंदर कोर्ट में दाखिल करना ही भूल गई. अब जब आरोप पत्र है ही नहीं, तो 90 दिन से ज्यादा आरोपी को जेल में कैसे बंद रखा जा सकता है? बस, इसी वजह से मनीष रंजन अपने-आप जमानत पर बाहर आ गया.

कहने को कहने वाले कह सकते हैं कि शायद सीबीआई चार्जशीट दाखिल करना भूल गई. पर सीबीआई की जिस जांच टीम में इतने लोग शामिल हों, जिनके पास अपना वकील हो, वो भला इतनी अहम बात कैसे भूल सकती है? ये अनजाने में हुई भूल तो कतई नहीं हो सकती. तो क्या सीबीआई ने जानबूझ कर मनीष रंजन को रिहाई का परवाना थमा दिया? पर क्यों? तो क्या सचमुच सत्ता के गलियारों में जारी ये चर्चा सच है कि इस केस के पीछे सत्ता के करीबी एक बड़े और ताकतवर शख्स का नाम है?

अभी तो आपने सिर्फ बानगी भर सुनी. सीबीआई ने जांच हाथ में लेने के बाद कदम कदम पर इस केस का कत्ल कैसे किया, अब सिलसिलेवार वो भी जान लीजिए. ये जो अब आपको बताने जा रहा हूं ये पटना में सत्ता के गलियारों में जारी चर्चा वाली बात नहीं है. बल्कि बाकायदा कोर्ट के अंदर खुद सीबीआई का अपना कुबूलनामा है. दरअसल, पटना की एक कोर्ट ने नाबालिग नीट छात्रा की मौत के मामले में सीबीआई से स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी. स्टेटस रिपोर्ट मतलब कि अब तक इस केस की जांच कहां तक पहुंची? उसी दौरान जज और सीबीआई के बीच सवालों और जवाबों का दौर चला था.

नीट छात्रा का केस सीबीआई को 30 जनवरी को सौंपा गया था. पूरी फरवरी और मार्च निकल गई. अप्रैल के पहले हफ्ते में पटना की एक अदालत ने सीबीआई को तलब कर ये पूछा कि केस की जांच कहां तक पहुंची है? शुरुआत में तो सीबीआई ने गोल-मोल जवाब देकर एक तरह से अदालत को ही गुमराह करने की कोशिश की. लेकिन फिर जब कोर्ट ने हर प्वाइंट पर सीधे सवाल पूछा तो सीबीआई फंस गई.

कोर्ट ने पूछा कि नीट की जिस छात्रा के साथ रेप हुआ और फिर क़त्ल, वो नाबालिग थी. लेकिन सीबीआई के किसी दस्तावेज या एफआईआर में पॉक्सो एक्ट के तहत धारा क्यों नहीं लगाई गई? जानते हैं सीबीआई का जवाब क्या था? कि पटना पुलिस ने शुरुआत में जो एफआईआर दर्ज की थी, उसमें पॉक्सो की धारा नहीं थी और खुद सीबीआई भी ये धारा लगाना भूल गई. अब सोचिए वो पॉक्सो, जिसमें सीधे 20 साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा हो, जिसमें जमानत मिलना सबसे मुश्किल है, उसी धारा को भूल कर सीबीआई किसकी मदद करने जा रही थी? कोर्ट की फटकार के बाद सीबीआई ने अदालत को भरोसा दिया कि वो इसमें पॉक्सो एक्ट की धारा भी जोड़ेगी.

कोर्ट ने दूसरा सवाल पूछा कि नीट छात्रा के अंडर गारमेंट्स पर जो स्पर्म पाए गए, क्या आपने पता किया कि वो किसके थे? सीबीआई फिर हैरान थी. कहा- अभी तो नहीं. पर हम पता लगा रहे हैं. पीड़िता के पास से जो फॉरेंसिक नमूने उठाए गए थे, उन्हें एम्स भेजा गया था. इन फॉरेंसिक नमूनो की रिपोर्ट इस केस में बेहद अहम मानी जा रही है. इससे आरोपियों तक पहुंचने में आसानी हो सकती है. जब कोर्ट ने पूछा कि एम्स की उस रिपोर्ट में क्या निकला? तो जानते हैं सीबीआई का जवाब क्या था? अभी तो हमने एम्स से वो रिपोर्ट ही नहीं मंगवाई.

शंभू गर्ल्स हॉस्टल का मालिक मनीष रंजन बेऊर जेल में बंद था. कोर्ट ने पूछा कि क्या सीबीआई ने मनीष रंजन से कोई पूछताछ की? या उसने कुछ खुलासा किया? सीबीआई का जवाब आया- अभी मनीष रंजन से कोई पूछताछ नहीं हुई है. है ना कमाल? इस केस में अब तक की जो इकलौती गिरफ्तारी हुई, वो मनीष रंजन था. गर्ल्स हॉस्टल का मालिक मनीष रंजन है. लेकिन हैरत की बात ये कि दो महीने से ज्यादा जांच को निकल गए, पर सीबीआई को ये सूझा ही नहीं कि चलो मनीष रंजन से भी पूछताछ कर लें. हालांकि मनीष रंजन को ढूंढने की भी जरूरत नहीं थी. बस बेऊर जेल तक जाना था. पर सीबीआई नहीं गई.

आपको जानकर हैरानी होगी कि इससे पहले जब पटना पुलिस ने मनीष रंजन को गिरफ्तार किया था, तब भी उससे कोई पूछताछ नहीं की गई थी. यानी मनीष रंजन करीब 3 महीने तक जेल में रहा, पर इन तीन महीनों में एक बार भी ना पटना पुलिस ने और ना ही सीबीआई ने उससे पूछताछ की. तो फिर सवाल ये कि आखिर मनीष रंजन को पकड़ा ही क्यों गया था? या फिर उससे बड़ा सवाल ये कि क्या मनीष रंजन ही वो शख्स है, जिसके पास इस केस का सारा सच है? और वही सच उस ताकतवर शख्स को बेनकाब कर सकता था.

कोर्ट ने सीबीआई से फिर पूछा. चलिए आपने मनीष रंजन से पूछताछ नहीं की. पर 5 और 6 फरवरी की रात जब नाबालिग नीट छात्रा उस हॉस्टल में थी, तो क्या आपने मनीष रंजन की कॉल डिटेल से ये पता लगाया कि वारदात वाली रात वो वहां था या नहीं? मनीष रंजन समेत कई संदिग्ध के कुल 8 मोबाइल आपकी कस्टडी में है. तो क्या मोबाइल टावर से उनके लोकेशन की जानकारी मिली? सीबीआई का जवाब था कि फिलहाल हमने वारदात वाली रात मनीष रंजन की लोकेशन या कॉल डिटेल की जांच नहीं की है. केस को हाथ में लिए सीबीआई को 2 महीने से ज्यादा हो चुके थे. तो सवाल तो बनता है ना कि ये सारी जरूरी चीजें जब की ही नहीं, तो फिर कर क्या रहे थे?

कुल मिलाकर, कोर्ट में सीबीआई के जवाब से ये पता चल चुका था कि नीट छात्रा की मौत कैसे हुई, रेप हुआ तो किसने किया, अंडर गारमेंट्स पर स्पर्म किसके थे, वो बेहोश कैसे हुई, उसे किसी ने मारा तो वो कौन था, इन सारी चीजों के पीछे वजह क्या थी? इनमें से एक भी सवाल का जवाब सीबीआई के पास नहीं था.

असल में ये वो केस है जिसकी जांच पिछले 3 महीने में पांच अलग-अलग टीमें या जांच एजेंसी कर चुकी है या कर रही है. सबसे पहले जब 11 जनवरी को नीट छात्रा की मौत हुई, तब उससे 2 दिन पहले 9 जनवरी को पटना पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी. मौत के दो दिन बाद 13 जनवरी को अचानक पटना पुलिस बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर ये ऐलान कर देती है कि नीट छात्रा की मौत मर्डर नहीं, सुसाइड है. और उसके साथ कोई रेप नहीं हुआ.

लगा केस खत्म. लेकिन तभी नीट छात्रा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आ जाती है. पूरा केस ही पलट जाता है. नीट छात्रा के जिस्म पर अनगिनत जख्म थे, जो कत्ल की तरफ इशारा कर रहे थे. इसके बाद जैसे ही फॉरेंसिक रिपोर्ट आई और उस रिपोर्ट में अंडर गारमेंट्स में स्पर्म मिलने के सबूत मिले, तो केस और पलट गया. अब शर्मिंदा पटना पुलिस से ये मामला लेकर एसआईटी को सौंप दिया गया. पर एसआईटी भी पटना पुलिस की शुरुआती लाइन पर ही तफ्तीश करने लगी. अब तक मामला तूल पकड़ चुका था. बिहार पुलिस पर मामले की लीपापोती के इल्जाम लगने शुरू हो चुके थे. इसी फजीहत से बचने के लिए तब बिहार सरकार ने 30 जनवरी को केस बिहार पुलिस लेकर सीबीआई को सौंपने की सिफारिश कर दी.

सीबीआई की पटना ब्रांच ने मामले की तफ्तीश शुरू कर दी. भारी भरकम टीम ने नीट छात्रा के घर जहानाबाद से लेकर गर्ल्स हॉस्टल तक पर छापेमारी की. बाकायदा मीडिया के कैमरों पर. तब इस केस के इनवेस्टिगेटिंग ऑफिसर थे एएसपी पवन कुमार श्रीवास्तव. लेकिन सीबीआई की ये टीम भी कहीं ना कहीं पटना पुलिस की शुरुआती लाइन पर ही जांच करने लगी. फिर बाद में सीबीआई को लगा कि जांच अधिकारी किसी महिला अफसर को होना चाहिए. तब सीबीआई की डीएसपी विभा कुमारी को केस का आईओ बना दिया गया. अब यही टीम इस केस की तफ्तीश कर रही थी. अप्रैल के पहले हफ्ते उस तक दिन तक जिस दिन कोर्ट के सामने स्टेटस रिपोर्ट देनी थी.

अब सीबीआई की पटना ब्रांच की जो टीम 2 महीने से भी ज्यादा वक्त में ना पॉक्सो धारा लगा पाई, ना मनीष रंजन से पूछताछ कर पाई, ना उसकी कॉल डिटेल देखने पढ़ने का वक्त निकाल पाई और ना एम्स से रिपोर्ट तक मंगा पाई, तो कोर्ट ने सीधे-सीधे कार्रवाई करते हुए आदेश दिया कि सीबीआई पटना ब्रांच की इस जांच टीम को ही हटा दिया जाए. कोर्ट ने आदेश दिया कि अब मामले की जांच दिल्ली में मौजूद सीबीआई को ट्रांसफर कर दी जाए. कोर्ट के हुक्म पर ऐसा ही हुआ. और इस तरह अब इस केस में पांचवें इनवेस्टिगेटिंग अफसर की एंट्री हो चुकी है. पर पांच-पांच आईओ के एक ही केस पर काम करने के बावजूद नतीजा ये है कि अब भी इस केस का कोई नतीजा नहीं निकला है. अलबत्ता मनीष रंजन जरूर जेल से बाहर निकल आया है.

(आजतक ब्यूरो)

—- समाप्त —-



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *