फिल्मी पर्दे पर जब तक विलेन हीरो की नाक में दम न कर दे, तब तक कहानी का मजा अधूरा रहता है. शोले का गब्बर हो या मिस्टर इंडिया का मोगैम्बो, इन किरदारों ने विलेनगिरी की ऐसी लकीर खींची कि लोग आज भी इन्हें याद करते हैं. लेकिन इसी दौर में एक ऐसा चेहरा भी था, जो बिना चिल्लाए और बिना डरावने चेहरे बनाए सिर्फ अपनी आंखों से दर्शकों के पसीने छुड़ा देता था.

करीब 250 फिल्मों में अपनी दहशत फैलाने वाला यह कलाकार नाम से भले ही सबको याद न हो, लेकिन इनका चेहरा देखते ही जेहन में 90 के दशक की फिल्मों के खतरनाक सीन ताजा हो जाते हैं. हम बात कर रहे हैं रामी रेड्डी की. जिन्होंने अपनी सधी हुई आवाज और मुंडे हुए सिर के साथ पर्दे पर खौफ का वो मंजर पैदा किया कि अच्छे-अच्छे विलेन उनके सामने फीके पड़ गए.

पहचान बना ली थी डायलॉग बोलने की शैली
रामी रेड्डी की सबसे बड़ी खूबी उनका डायलॉग बोलने का अंदाज था. वह अक्सर बिना किसी उतार-चढ़ाव के, बिल्कुल सपाट और एक ही सुर में अपनी बात कहते थे, जो सुनने में बेहद डरावना लगता था. फिल्म ‘वक्त हमारा है’ में ‘कर्नल शिकारा’ बनकर उन्होंने जो आतंक मचाया, उसे लोग आज भी नहीं भूले हैं. वहीं ‘हकीकत’ फिल्म का उनका ‘अन्ना’ वाला किरदार हो या उनकी सुर्ख लाल आंखें, उन्होंने अपनी एक अलग ही पहचान बना ली थी. वे जब भी स्क्रीन पर आते थे, दर्शकों को पता चल जाता था कि अब कुछ बुरा होने वाला है.

पत्रकार की नौकरी छोड़ पहुंचे थे मायानगरी
कम ही लोग जानते हैं कि गंगासानी रामी रेड्डी फिल्मों में आने से पहले एक पत्रकार थे. आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के रहने वाले रामी ने हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म की पढ़ाई की थी. उन्होंने ‘MF Daily’ नाम के अखबार में काम भी किया, लेकिन उनके अंदर का कलाकार उन्हें शांत नहीं रहने दे रहा था. आखिरकार उन्होंने पत्रकारिता को अलविदा कह दिया और तेलुगू फिल्मों का रुख किया. 1989 की फिल्म ‘अंकुशम’ में उनका डायलॉग ‘स्पॉट पेदथा’ इतना हिट हुआ कि वह रातों-रात मशहूर हो गए. जब इसी फिल्म का हिंदी रीमेक ‘प्रतिबंध’ बना, तो उन्होंने ‘ स्पॉट नाना’ का वही किरदार फिर से निभाया और बॉलीवुड में अपनी जगह पक्की कर ली.

साउथ इंडियन एक्सेंट वाली टोन में बोले गए उनके डायलॉग जैसे, ‘नाना को ना सुनने की आदत नहीं है.’,  ‘तबाही की आंधी और बर्बादी के तूफान का नाम है चिकारा’, और ‘दुश्मन के पास अगर ताकत के साथ-साथ दिमाग भी हो… तो वार उसके हाथ पर नहीं, गर्दन पर करना चाहिए’ उनकी पहचान बन गए. रामी रेड्डी की ताकत का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अगर उनकी आवाज भी आप सुन लें तो आप समझ जाएंगे कि ये कौन बोल रहा है.

कैंसर की जंग और वो आखिरी मुश्किल दिन
सफलता के शिखर पर रहने के बाद रामी रेड्डी की जिंदगी में साल 2010 में एक काला दौर आया. उनकी सेहत अचानक बिगड़ने लगी और जांच में पता चला कि उन्हें लिवर कैंसर है. बीमारी इतनी बढ़ चुकी थी कि इसका असर उनकी किडनी पर भी पड़ने लगा था. जो शख्स पर्दे पर पहलवानों को धूल चटा देता था, वह बीमारी की वजह से अंदर ही अंदर घुलने लगा. आखिरी दिनों में उनकी हालत ऐसी हो गई थी कि उन्हें पहचान पाना भी मुश्किल था. शरीर सूखकर कांटा हो गया था, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति अभी भी मजबूत थी.

खामोशी से दुनिया को कह दिया अलविदा
कैंसर से बहादुरी से लड़ते हुए आखिरकार 14 अप्रैल, 2011 को इस महान कलाकार ने हैदराबाद में दम तोड़ दिया. महज 52 साल की उम्र में रामी रेड्डी का जाना फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा झटका था. उनके पीछे उनकी पत्नी, एक बेटा और दो बेटियां रह गईं. आज भले ही रामी रेड्डी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन 90 के दशक की फिल्मों का जब भी जिक्र होगा, ‘स्पॉट अन्ना’ की वो डरावनी खामोशी हमेशा फैंस के दिलों में जिंदा रहेगी. विलेन की दुनिया का यह वो सितारा था जिसने साबित किया कि डर पैदा करने के लिए चीखना जरूरी नहीं, सिर्फ नजरें ही काफी होती हैं.

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