हम भारतीयों के दिमाग में यूएस-कनाडा जैसे विकसित देशों की इमेज कुछ ऐसी बनी है, जैसे-इन देशों में सब कुछ परफेक्ट है. हालांकि कई मामलों में हक़ीकत इसके उलट है. इन देशों में जनसंख्या काफी कम होती है और अधिकतर मामलों में संसाधनों की भरमार है. जिसका सीधा-सीधा मतलब ये निकाल लिया जाता है कि इन देशों के पास किसी चीज़ की कमी नहीं है लेकिन संसाधनों की भरमार और आसानी इंसान को ‘लचर’ बना देती है.

कुछ ऐसा ही हाल इन देशों के लोगों के साथ हुआ है. भारत समेत कई विकासशील देशों में स्थिति इससे उलट है. यूथ है, मेहनती है लेकिन काम नहीं है, संसाधनों की कमी है. इस स्थिति से परेशान होकर लोग अन्य देशों का रुख करते हैं और कनाडा जैसे देश समय-समय पर इमिग्रेशन की रफ्तार तेज़ करते हैं, ताकि अन्य देशों के मेहनती लोग यहां आकर काम कर सकें.

पिछले कुछ सालों में यहां बड़ी तादाद में लोग आए, जिससे यहां के सिस्टम पर दबाव बढ़ गया. हेल्थकेयर भी इसका शिकार हुआ. दूसरे लफ्जों में कहा जाए तो कनाडा डॉक्टर-नर्सों की कमी से जूझ रहा है.

जिसकी शिकार बनी 12 हफ्तों की प्रेग्नेंट एक महिला…

मामला कनाडा के क्यूबेक प्रांत का है, जहां रोज गेरवेस नाम की महिला अपने तीसरे बच्चे की उम्मीद से थीं. सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन 12 हफ्तों की जांच में डॉक्टरों ने बताया भ्रूण का दिमाग विकसित नहीं हुआ है और अब गर्भावस्था को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता. यह खबर किसी भी मां-बाप को झंझोड़ने के लिए काफी है लेकिन असली मुश्किल इसके बाद शुरू हुई.

डॉक्टरों ने साफ कहा कि इस स्थिति में अबॉर्शन ही एक ऑप्शन है लेकिन प्रेग्नेंसी 12 हफ्तों से ज्यादा हो चुकी थीं और उनके इलाके में सर्जिकल अबॉर्शन की सुविधा लिमिटेड थी. वहां से क्यूबेक सिटी सबसे नजदीकी ऑप्शन था, लेकिन वहां भी अपॉइंटमेंट मिलने में कई दिन का इंतजार था. मेडिकल सिस्टम पहले से ही दबाव में था. कम स्टाफ, सीमित ऑपरेशन स्लॉट और बढ़ती मांग. इस बीच महिला लगातार गर्भावस्था का दर्द भी झेल रही थी… उल्टी, थकान और मेंटल प्रेशर क्योंकि बॉडी अब भी नॉर्मल प्रेग्नेंसी जैसा ही रिएक्ट कर रही थी.

कई जगह हाथ-पैर मारने के बाद पति-पत्नी ने मॉन्ट्रियाल जाने का फैसला किया, जो लगभग 900 किलोमीटर दूर था. इसके लिए उन्हें महंगा फ्लाइट टिकट बुक करना पड़ा, इलाज के लिए एक मोटा खर्च उठाना पड़ा, जबकि कनाडा में हेल्थकेयर फ्री है. इसके अलावा मानसिक तनाव अलग.

मॉन्ट्रियल पहुंचकर उनका सर्जिकल अबॉर्शन किया गया. महिला ने बाद में बताया कि ये बेहद मुश्किल वक्त था. एक तरफ बच्चा खोने का दर्द, दूसरी तरफ सिस्टम की जटिलताएं. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में महिलाएं सिर्फ मेडिकल नहीं, बल्कि भावनात्मक और सिस्टम का बोझ भी उठाती हैं.

इस पूरे मामले पर डॉक्टरों ने भी स्वीकार किया कि समस्या केवल एक केस की नहीं है. कई मरीजों को समय पर अपॉइंटमेंट नहीं मिल पाता और उन्हें दूर-दराज शहरों में भेजा जाता है. डॉक्टरों का कहना है कि अस्पतालों में स्टाफ की कमी है. सर्जिकल स्लॉट सीमित हैं और बढ़ती डिमांड के मुकाबले सिस्टम कमजोर पड़ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि कनाडा में मेडिकल सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन वे हर जगह समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं.

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