अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को लेकर 1 मई की तारीख बेहद अहम हो गई है. एक तरफ ट्रंप पर जंग जारी रखने का दबाव है, दूसरी तरफ 1 मई वो डेडलाइन है जो ट्रंप की मुश्किलें बढ़ा सकता है.

न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1973 के एक पुराने कानून ‘वॉर पावर्स रेजोल्यूशन’ की वजह से ट्रंप पर युद्ध जारी का भारी दबाव है. लेकिन अमेरिकी कानून के मुताबिक, राष्ट्रपति बिना संसद (कांग्रेस) की मंजूरी के सिर्फ 60 दिनों तक ही अपनी सेना को युद्ध में रख सकते हैं.

अमेरिका ने 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया था. हालांकि, इसकी जानकारी 2 मार्च को संसद को दी गई. इस हिसाब से 60 दिनों की समय सीमा 1 मई को खत्म हो रही है.

ट्रंप के पास अब क्या ऑप्शन?

अब ट्रंप के पास दो ही रास्ते हैं- या तो वो संसद से इस युद्ध के लिए मंजूरी लें, या फिर अपनी सेना को पीछे हटाएं. अभी तक ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी एकजुट होकर उनके साथ खड़ी थी. लेकिन अब कुछ सांसदों के सुर बदलने लगे हैं. यूटा के सीनेटर जॉन कर्टिस ने साफ कह दिया है कि 60 दिनों के बाद वो बिना संसदीय मंजूरी के सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं करेंगे.

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हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के अध्यक्ष ब्रायन मास्ट ने भी चेतावनी दी है कि 1 मई के बाद वोटिंग का समीकरण बदल सकता है. ये ट्रंप के लिए चिंता की बात है, क्योंकि अभी तक वो अपनी मर्जी से फैसले ले रहे थे.

1 मई के बाद क्या होगा?

अगर अमेरिकी संसद युद्ध को आगे बढ़ाने की इजाजत नहीं देती है, तो ट्रंप को संसद से मंजूरी की अपील करनी होगी, जो फिलहाल मुश्किल लग रहा है. अगर मंजूरी नहीं मिलती है तो ईरान से अपनी सेना को वापसी बुलाना होगा. हालांकि, सेना की सुरक्षित वापसी के लिए कानून के तहत 30 दिनों का अतिरिक्त समय मिल सकता है. लेकिन इस दौरान हमले जारी नहीं रखे जा सकते.

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