नोएडा में हजारों फैक्ट्रीज, लाखों जॉब पर… मॉल-मेट्रो वाले चमचमाते शहर में 10×10 के कमरे में कैसे हो गुजारा? – noida industrial development low salary working conditions youth employment edmm


उत्तर प्रदेश के आंकड़ों में नोएडा आज ‘इंडस्ट्रियल हब’ का ताज पहने खड़ा है, जहां पिछले 9 सालों में रिकॉर्ड तोड़ फैक्ट्रियां रजिस्टर्ड हुई हैं. लेकिन जब सरकारी आंकड़ों की चमक जमीन पर उतरती है, तो सेक्टर-62 और 59 की सड़कों पर लगे जाम और नारों में बदल जाती है. यहां कम सैलरी वाला करियर स‍िर्फ ‘सर्वाइवल’ बनकर रह गया है. आइए जानते हैं कि कैसे चमकते नोएडा में एक डिग्री होल्डर छात्र अपना ‘वजूद’ तलाश रहा है.

उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ के आंकड़े बताते हैं कि 2017 से अब तक राज्य में 17,841 नई फैक्ट्रियां खुली हैं. पश्चिमी यूपी, खासकर नोएडाइसका सबसे बड़ा केंद्र है. लेकिन इन आंकड़ों के पीछे उन हजारों युवाओं की सिसकियां छिपी हैं, जो बीए और बीकॉम की डिग्री हाथ में लेकर इन फैक्ट्रीज के गेट पर खड़े मिलते हैं.

हकीकत ये है कि यहां नौकरी तो मिल जाती है, लेकिन हकीकत यह है कि यहां ‘जबड़े कसे’ रखने पड़ते हैं. यहां चुप्पी साधकर शोषण सहने की मजबूरी है.

कमाई 10 से 15 हजार, खर्च 20 हजार, समझें नोएडा का गणित

कमरे का किराया: एक छोटा सा कमरा (सिंगल रूम) 4,000 से 7,000 रुपये से कम में नहीं मिलता.
खान-पान और बिजली: मेस का खाना और बिजली का बिल मिलाकर 4,000-5,000 रुपये खर्च हो जाते हैं.
ट्रांसपोर्ट और मोबाइल: 2,000 रुपये का न्यूनतम खर्च.
कुल खर्च: लगभग 12,000-14,000 रुपये. अब सवाल यह है कि अगर सैलरी ही 15,000 रुपये है, तो वो युवा अपने घर क्या भेजेगा. अगर शादीशुदा है तो बीवी बच्चों का पेट कैसे पालेगा और अपनी ‘लाइफस्टाइल’ कैसे मेंटेन करेगा?

लाइफस्टाइल का दिखावा और अंदरूनी तनाव
नोएडा एक ‘कॉस्मोपॉलिटन’ शहर है. यहां के बड़े मॉल, ऊंची इमारतें और चमक-धमक एक ‘एस्पिरेशनल’ दबाव पैदा करती हैं. यहां एक छात्र जो गांव से आता है, वह खुद को इस शहर का हिस्सा दिखाने के लिए महंगे फोन या कपड़ों की ईएमआई (EMI) के जाल में फंस जाता है.

नोएडा के प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का इकलौता बड़ा आरोप सैलरी को लेकर है. उनका कहना है कि कागजों पर तो वे ‘कुशल श्रमिक’ हैं, लेकिन असलियत में वे ‘वर्किंग पुअर’ की श्रेणी में हैं. एक कर्मचारी ने मीड‍िया को द‍िए इंटरव्यू में कहा कि उनके जैसे कई कर्मचारी हैं जो 12-12 घंटे काम करते हैं मगर सैलरी 15 हजार मिल रही है. सिर्फ 15 हजार में नोएडा जैसी जगह में गुजारा करना बहुत मुश्क‍िल है.

वहीं आंकड़े कहते हैं कि यूपी में 118 ऐसी बड़ी फैक्ट्रियां हैं जहां 1,000 से ज्यादा कर्मचारी हैं. लेकिन क्या वहां की कैंटीन, मेडिकल सुविधाएं और कार्यस्थल का माहौल एक डिग्री होल्डर छात्र के सम्मान के अनुरूप है? प्रदर्शनकारियों का कहना है कि काम के घंटों का कोई हिसाब नहीं है और बोनस स‍िर्फ चुनावी वादों जैसा है.

क्या स‍िर्फ फैक्ट्री बढ़ाना काफी है?
इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट को आवंटित 28,864 करोड़ रुपये का बजट सराहनीय है, लेकिन जब तक ‘लिविंग वेज’ (जीने लायक वेतन) और ‘वर्किंग कंडीशन्स’ पर सख्ती नहीं होगी, तब तक ये फैक्ट्रियां स‍िर्फ मजदूरों की फौज पैदा करेंगी, ‘करियर’ नहीं.

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