सम्राट चौधरी का बिहार के अगले मुख्यमंत्री के रूप में उभरना राज्य की राजनीति में एक बड़े और निर्णायक बदलाव का संकेत है. यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि इस बात का स्पष्ट इशारा है कि भारतीय जनता पार्टी अब बिहार में सहयोगी दलों पर निर्भर रहने के बजाय अपने चेहरे के साथ सत्ता की कमान संभालने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद के लिए उपयुक्त माना जा रहा है, क्योंकि उनके पास लंबा राजनीतिक अनुभव, मजबूत सामाजिक आधार और प्रशासनिक समझ का संतुलित मेल है. उन्होंने 1990 के दशक से सक्रिय राजनीति में रहते हुए बिहार की राजनीति के हर बड़े दौर मंडल राजनीति, गठबंधन सरकारों और भाजपा के उभार को करीब से देखा है. यही अनुभव उन्हें जमीनी स्तर से जुड़ा और व्यावहारिक नेता बनाता है.
उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका सामाजिक समीकरण माना जाता है. वह कुशवाहा (कोइरी) समुदाय से आते हैं, जिसकी राज्य में अहम हिस्सेदारी है. जब इसे नीतीश कुमार के कुर्मी समुदाय और अन्य पिछड़ा व अति पिछड़ा वर्ग के साथ जोड़ा जाए, तो यह समूह राज्य की करीब 60 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है. ऐसे में यह सामाजिक आधार उन्हें एक मजबूत राजनीतिक चेहरा बनाता है.
2024 से उपमुख्यमंत्री की भूमिका में थे
प्रशासनिक अनुभव की बात करें तो वर्ष 2024 से उपमुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने वित्त, शहरी विकास और पंचायती राज जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली. इन विभागों के जरिए उन्हें शासन की बारीकियों को समझने और राज्य संचालन का व्यावहारिक अनुभव मिला, जो उन्हें केवल राजनीतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक रूप से भी सक्षम बनाता है.
RJD से की करियर की शुरुआत
उनका राजनीतिक सफर भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से की और 1999 में राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बने. इसके बाद उन्होंने जनता दल यूनाइटेड का रुख किया, जहां उन्होंने नीतीश कुमार के नेतृत्व में काम किया. हालांकि, 2018 में भाजपा में शामिल होने के बाद उनका राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा. कुल मिलाकर वह तीन प्रमुख दलों का हिस्सा रह चुके हैं और दो बार पार्टी बदल चुके हैं.
वर्ष 2014 में उन्होंने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम उठाते हुए राजद के विधायकों के एक समूह को तोड़ने में भूमिका निभाई थी, जिससे यह साफ हुआ कि वह केवल अनुयायी नहीं, बल्कि निर्णायक फैसले लेने वाले नेता हैं. भाजपा में उनका सफर भी योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ा, पहले प्रदेश अध्यक्ष बने, फिर चुनावों में प्रमुख चेहरा और बाद में उपमुख्यमंत्री. आज वह बिहार में भाजपा के प्रमुख ओबीसी चेहरों में गिने जाते हैं.
नीतीश कुमार के साथ मिलकर किया काम
सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार के संबंधों में भी समय के साथ बड़ा बदलाव आया. एक समय वे नीतीश कुमार के सबसे बड़े आलोचकों में थे और उन्हें खुलकर चुनौती देते थे. लेकिन 2024 से 2026 के बीच गठबंधन की राजनीति में परिस्थितियां बदलीं और उपमुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने नीतीश कुमार के साथ मिलकर काम किया. धीरे-धीरे यह संबंध विरोध से सहयोग में बदल गया, जो बिहार की गठबंधन राजनीति की वास्तविकता को दर्शाता है.
उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी राजनीतिक रूप से मजबूत रही है. उनके पिता शकुनी चौधरी भी एक जाने-माने नेता थे और उनका भी नीतीश कुमार से राजनीतिक मतभेद रहा था. ऐसे में सम्राट चौधरी का विरोध से सहयोग तक का सफर बिहार की बदलती राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है.
उनके पास 30 साल से अधिक का अनुभव, कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी और मजबूत जनाधार है. वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने तारापुर सीट से 40 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की. उनका सीधा प्रभाव 8 से 10 प्रतिशत मतदाताओं पर माना जाता है, जबकि भाजपा में उनकी स्थिति उन्हें और व्यापक समर्थन दिलाती है.
राजनीतिक करियर में कुछ विवाद भी जुड़े
हालांकि, उनके राजनीतिक करियर में कुछ विवाद भी जुड़े रहे हैं. 1995 के एक हत्या मामले में उनका नाम सामने आया था, हालांकि उन्होंने इसमें किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया और उनके खिलाफ आरोप तय नहीं हुए. 1999 में उनकी उम्र को लेकर भी विवाद हुआ था, जब मंत्री बनने के लिए न्यूनतम आयु पर सवाल उठे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसके अलावा, उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी सवाल उठे, जब उनके हलफनामे में ‘ऑनरेरी डिग्री’ और ‘PFC’ का जिक्र था, लेकिन इसका स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया.
एक और चर्चित पहलू उनका ‘मुरेठा’ (पगड़ी) रहा, जिसे उन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ आंदोलन के दौरान पहन रखा था और संकल्प लिया था कि जब तक उन्हें सत्ता से हटाया नहीं जाएगा, वह इसे नहीं उतारेंगे. बाद में जब उन्होंने नीतीश के साथ सरकार में काम किया, तो यह मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय बना.
सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना भाजपा की बड़ी रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है. लंबे समय तक पार्टी बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व पर निर्भर रही, लेकिन अब वह खुद को मुख्य शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में बढ़ रही है. यह बदलाव संकेत देता है कि भाजपा अब सहयोगी की भूमिका से आगे बढ़कर नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहती है.
कुल मिलाकर, सम्राट चौधरी का उदय केवल एक व्यक्ति का सत्ता तक पहुंचना नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है, जहां सामाजिक समीकरण, अनुभव और संगठनात्मक ताकत मिलकर राज्य की दिशा तय करेंगे.
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