न‍िशांत कुमार ने ड‍िप्‍टी सीएम ऑफर को लेकर तेजस्‍वी के बजाय राहुल गांधी होना क्‍यों चुना? – nishant kumar tejashwi yadav deputy cm rahul gandhi nitish bihar ntcpmr


निशांत कुमार के डिप्टी सीएम बनने की बात चल रही थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. निशांत कुमार सरकार में शामिल नहीं हुए. नई सरकार में जेडीयू कोटे से दो डिप्टी सीएम बनने थे, उनमें से एक नाम निशांत कुमार का लिया जा रहा था. व्यवस्था नहीं बदलनी थी, सिर्फ व्यक्ति बदला जाना था. और, बदलाव हो गया. नीतीश कुमार की जगह बीजेपी के सम्राट चौधरी.

विजय कुमार चौधरी का डिप्टी सीएम बनना तो पक्का ही था. ऐसा नेता जो पहले भी नीतीश कुमार की आंख, नाक और कान के साथ साथ जुबान भी रहा हो, और निश्चित तौर पर आगे भी रहेगा. जेडीयू की टॉप लीडरशिप में विजय कुमार चौधरी ही ऐसे नेता हैं, जिन्हें नीतीश कुमार के प्रति निष्ठावान माना जाता है – दूसरे डिप्टी सीएम बिजेंद्र प्रसाद यादव.

सरकार तो बहुत दूर की बात है, निशांत कुमार के पास जेडीयू में भी कोई पद नहीं है. वह एक साधारण सदस्य की तरह हैं. यह बात अलग है कि निशांत कुमार को भी जेडीयू में उतना ही भाव मिल रहा है, जैसा राहुल गांधी को कांग्रेस में मिलता रहा है. नेपथ्य में रहने से क्या होता है, निशांत कुमार भी हैं तो युवराज ही. अब राजनीतिक समीकरण ऐसे हैं, जिसमें निशांत कुमार को राहुल गांधी या तेजस्वी यादव की तरह तंज भरे लहजे में युवराज नहीं बुलाया जाता.

राजनीति में न‍िशांत, तेजस्‍वी और राहुल गांधी होना

निशांत कुमार हों, तेजस्वी यादव हों या फिर राहुल गांधी. तीनों के राजनीति में आने की एक ही वजह है. परिवारवाद की राजनीति. वही राजनीति, नीतीश कुमार जिसके कट्टर विरोधी रहे हैं. वही राजनीति, जिसकी वजह से नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव को दो-दो बार बिहार का डिप्टी सीएम बनाया – लेकिन, निशांत कुमार के मामले में वैसा नहीं हुआ है.

2015 में नीतीश कुमार ने लालू यादव के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया था. चुनाव जीतने के बाद नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने, और दोनों बेटों को मंत्री बनवा दिए. तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बने. 2022 में जब नीतीश कुमार दोबारा महागठबंधन के मुख्यमंत्री बने, तो तेजस्वी यादव फिर से डिप्टी सीएम बन गए. वैसे 2020 और 2025 के बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे.

जिन परिस्थितियों में तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बने, राहुल गांधी के पास भी एक वक्त प्रधानमंत्री बनने का मौका हुआ करता था. बल्कि, ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ डॉक्टर मनमोहन सिंह की तरफ से तो कई बार ऐसे संकेत भी मिले कि अगर राहुल गांधी की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा होती, तो कुर्सी खाली होते देर भी नहीं लगती.

2004 के आम चुनाव के बाद की परिस्थितियां अलग थीं. बीजेपी सोनिया गांधी के खिलाफ आक्रामक हो गई थी. सोनिया गांधी पर विदेशी मूल का ठप्पा लगाकर उनके प्रधानमंत्री बनने पर बीजेपी ने जोरदार मुहिम चलाई. लेकिन, 2009 में परिस्थितियां काफी बदल चुकी थीं. कांग्रेस ने चुनाव जीतकर सत्ता में वापसी की थी. और, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मिली ज्यादा सीटों का श्रेय भी राहुल गांधी को ही दिया जा रहा था.

लेकिन, राहुल गांधी का कुछ और ही प्लान था. कई बार सुनने में भी आया कि कोई पद लेने से पहले राहुल गांधी सिस्टम बदलना चाहते थे. सिस्टम कितना बदल पाया, बेहतर वही जानते होंगे. बाद में, राहुल गांधी कांग्रेस के सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री बनने की बात भी करने लगे थे. 2014 और 2019 तो नहीं, लेकिन आखिरकार 2024 में राहुल गांधी ने नेता प्रतिपक्ष बनने का फैसला किया, और बने हुए हैं.

निशांत कुमार के सामने राजनीति का दो मॉडल थे. तेजस्वी यादव मॉडल और राहुल गांधी मॉडल. निशांत कुमार ने लगता है, फिलहाल राहुल गांधी मॉडल ही चुना है.

निशांत कुमार का प्लान क्या है

निशांत कुमार भी राहुल गांधी की शुरुआती राजनीति की तरह अभी लर्निंग मोड में लगते हैं. सच भी यही है कि निशांत कुमार को राजनीति सीखनी है. निशांत कुमार ने भी बाकियों की तरह राजनीति को बेहद करीब से देखा है, लेकिन किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में कभी शामिल नहीं हुए.

जिस दिन निशांत कुमार जेडीयू के सक्रिय सदस्य बने थे, चर्चा तो उसी दिन से उनको नई सरकार में डिप्टी सीएम बनाने की शुरू हो गई थी. जेडीयू कार्यकर्ताओं की तरफ से भी कई बार ऐसी डिमांड हुई. पोस्टर तो निशांत कुमार को मुख्यमंत्री तक बनाने के लिए लगाए गए.

बताते हैं कि निशांत कुमार के सामने सरकार और संगठन में सक्रिय और शामिल होने का प्रस्ताव नीतीश कुमार की मौजूदगी में रखा गया था. लेकिन, निशांत कुमार तैयार नहीं हुए. रिपोर्ट के अनुसार, निशांत कुमार चाहते हैं कि पहले बिहार के जिलों में जाकर जेडीयू के नेताओं से मिलें. उनसे बात करें. वस्तुस्थिति को समझें. उनके मन की बात सुनें. जमीनी स्तर पर सूरत-ए-हाल क्या है, बारीकी से समझें – और उसके बाद आगे बढ़ें.

निशांत कुमार लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ना चाह रहे हैं. निशांत कुमार इसलिए जेडीयू नेता बनना या सरकार में शामिल होना नहीं चाहते, क्योंकि वह नीतीश कुमार के बेटे हैं. निशांत कुमार पहले राजनीति का जमीनी अनुभव लेना चाहते हैं – और उसके बाद ही अपनी भूमिका को लेकर कोई फैसला लेना चाहते हैं.

कुछ कुछ अखिलेश यादव की तरह. अखिलेश यादव ने भी 2012 के चुनाव से पहले लंबी यात्रा की थी. साइकिल पर सवार होकर पूरे उत्तर प्रदेश में घूमते रहे. चुनाव आने पर समाजवादी पार्टी को जीत दिलाई, फिर मुख्यमंत्री बने. अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच गए तो थे, मुलायम सिंह यादव के बेटे बनकर ही. लेकिन, लौटे थे समाजवादी पार्टी के नए नेता बनकर.

सरकार में निशांत के शामिल न होने के फायदे

निशांत कुमार के जेडीयू में शामिल होने के बाद चर्चा होने लगी थी कि नीतीश कुमार ने जिस बात का शुरू से विरोध किया, आखिर में उसी परिवारवाद की राजनीति को अपना लिया. बेटे को भी राजनीति में उतार दिया. लालू यादव तो ये सब डंके की चोट पर करते रहे हैं. लालू यादव तो खुलेआम कह चुके हैं, वारिस बेटा नहीं होगा तो क्या भैंस चराएगा?

और, सिर्फ लालू यादव ही क्यों, एनडीए में ही नीतीश कुमार के गठबंधन पार्टनर उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी मिसाल हैं. पूरा परिवार, बल्कि रिश्तेदार भी विधायक और मंत्री बन चुके हैं.

1. निशांत कुमार के बिहार की नई सरकार में शामिल न होने से नीतीश कुमार पर आखिरी दौर में परिवारवाद की राजनीति करने की लगने वाली तोहमत का असर अपने आप कम हो जाएगा.

2. अगर निशांत कुमार सरकार में डिप्टी सीएम बन जाते तो लालू यादव की राजनीति और नीतीश कुमार की राजनीति में कोई फर्क नहीं रह जाता.

3. अगर बाद में निशांत कुमार सरकार में शामिल भी होते हैं, तो उसके लिए बीजेपी को जवाबदेह माना जाएगा, न कि नीतीश कुमार को. क्योंकि, नीतीश कुमार ने तो अपने हाथ में पावर रहते बेटे को न तो संगठन में कोई पद दिया है, न ही सरकार में कोई कुर्सी.

4. विजय कुमार चौधरी जेडीयू के अनुभवी नेता हैं. नीतीश कुमार के बेहद भरोसेमंद और करीबी होने के कारण उनकी बातों को अच्छी तरह समझते रहे हैं. डिप्टी सीएम बनकर विजय कुमार चौधरी चीजों को बैलेंस और जेडीयू के पक्ष में बनाए रखने की पूरी कोशिश करेंगे.

5. बिजेंद्र प्रसाद यादव सत्ता के जातीय समीकरणों में तो फिट हैं ही, माना जा रहा है कि निशांत कुमार के लिए भी एक कुर्सी रिजर्व कर रखी है. जब तक निशांत कुमार कुछ अनुभव हासिल नहीं कर लेते, बने रह सकते हैं.

क्या सरकार में शामिल नहीं होने का निर्णय, निशांत कुमार का निजी फैसला है? या फिर, यह भी नीतीश कुमार की रणनीति का हिस्सा है? अभी तो यही बताया जा रहा है कि निशांत कुमार ने फिलहाल ऐसी कोई जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया है, क्योंकि उनका अलग प्लान है.

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