अप्रैल 2026 की 11 तारीख को चार अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री प्रशांत महासागर में सुरक्षित उतर गए. वे चंद्रमा की यात्रा करके लौटे थे. 54 साल बाद इंसानों ने इतनी दूर अंतरिक्ष में यात्रा की. नासा की यह सफलता पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गई है. अब सबकी नजर भारत के अपने मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान पर है.
गगनयान भारत की अंतरिक्ष क्षमता का सबसे बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा था. लेकिन अब इसमें देरी हो रही है और अनिश्चितता बढ़ गई है. पहले 2022 में भारतीय अंतरिक्ष यात्री स्वदेशी रॉकेट से अंतरिक्ष में जाने की योजना थी. अब लक्ष्य 2027 कर दिया गया है. सवाल यह है कि क्या भारत इस नये लक्ष्य को हासिल कर पाएगा?
गगनयान की असली चुनौतियां और इसरो की सच्चाई
गगनयान मिशन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभी तक उसके दो जरूरी बिना-क्रू यानी बिना इंसान वाले फ्लाइट टेस्ट पूरी नहीं हुई हैं. ये दोनों उड़ानें बहुत महत्वपूर्ण हैं. इनमें क्रू एस्केप सिस्टम, लाइफ सपोर्ट सिस्टम, एवियोनिक्स, सुरक्षा और पूरी मिशन की संरचना को असली उड़ान की स्थिति में जांचा जाता है. बिना इन परीक्षणों के इंसान भेजना असंभव है. अप्रैल 2026 तक ये दोनों उड़ानें नहीं हुई हैं. इससे समयसीमा बहुत कम हो गई है.
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इसके अलावा श्रीहरिकोटा में लॉन्च गतिविधियां भी धीमी पड़ गई हैं. इसरो ने 2026 के लिए 18 लॉन्च की घोषणा की थी. लेकिन साल के पहले चार महीनों में सिर्फ एक लॉन्च हुआ और वह भी असफल रहा. पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल यानी PSLV की दो असफलताओं के बाद आंतरिक जांच चल रही है. जांच के नतीजे अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं.
जब तक समस्या की जड़ समझ नहीं आ जाती और सुधार नहीं हो जाता, इसरो ने बहुत सावधानी बरतनी शुरू कर दी है. हर रॉकेट को फिर से जांचा जा रहा है. हर सिस्टम, सब-सिस्टम और हर पार्ट को दोबारा चेक किया जा रहा है. बाहर की टीम भी ऑडिट कर रही है. यह सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है, लेकिन गगनयान के लिए यह बहुत बड़ा झटका है. मानव अंतरिक्ष यात्रा में रॉकेट की विश्वसनीयता 100 प्रतिशत होनी चाहिए. लॉन्च करने वाले रॉकेट में कोई भी समस्या पूरे मिशन को प्रभावित करती है.
गगनयान टीम कहां है?
लॉन्च तैयारियों के अलावा गगनयान के अंदरूनी विकास की रफ्तार भी उम्मीद से कम है. कोविड-19 के कारण 2020 में शुरुआत देरी से हुई थी. उसके बाद कुछ गति बढ़ी, लेकिन इसरो और ह्यूमन स्पेस फ्लाइट सेंटर के वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि यह प्रगति 2027 में क्रूड मिशन के लिए पर्याप्त नहीं है. पर्यावरण नियंत्रण, क्रू सिक्योरिटी प्रोटोकॉल और मिशन इंटीग्रेशन जैसे महत्वपूर्ण सिस्टम अब भी बीच प्रोसेस में हैं.

मानव अंतरिक्ष यात्रा का एक अहम हिस्सा जमीन पर काम करने वाली टीम है. इसरो ने अभी तक मिशन कंट्रोल कर्मी, ग्राउंड टीम और अंतरिक्ष यात्री सहायता यूनिट को पूरी तरह तैयार नहीं किया है. ये टीमें ही असल समय में अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा, इमरजेंसी और रिकवरी संभालती हैं. हाल ही में लद्दाख में एक सिमुलेशन अभ्यास हुआ था. इसे मिशन मित्र कहा गया. यह सिर्फ शुरुआती कदम था. इसका मकसद चयन प्रोटोकॉल बनाना था.
अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने बताया कि मिशन मित्र में टीम कैसे काम करती है. कैसे सहयोग करती है. तनावपूर्ण हालात में कैसे एक-दूसरे को समझती है. एयर कमोडोर पी बालकृष्णन नायर ने कहा कि अलग-अलग बैकग्राउंड वाले लोग एक-दूसरे के साथ जल्दी मैच अप कैसे करते हैं, यही सबसे बड़ी परीक्षा थी. लेकिन अब भी इसरो ने कोई आधिकारिक समयसीमा नहीं बताई है कि ये टीमें कब पूरी तरह तैयार होंगी.
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भारत को सिर्फ चार अंतरिक्ष यात्रियों से ज्यादा की जरूरत है
गगनयान मिशन में सिर्फ तीन अंतरिक्ष यात्री लो अर्थ ऑर्बिट में जाएंगे. इसके लिए भारत के पास अभी सिर्फ चार अंतरिक्ष यात्री हैं. लेकिन भविष्य की योजनाएं बहुत बड़ी हैं. 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल और 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय को उतरना है. इतनी बड़ी योजनाओं के लिए ज्यादा अंतरिक्ष यात्री तैयार करने की जरूरत है.

चार में से तीन अंतरिक्ष यात्री – एयर कमोडोर पी बालकृष्णन नायर, ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला और ग्रुप कैप्टन अंगद सिंह – जल्द ही रिव्यू के लिए तैयार हैं. सात साल इसरो के साथ बिताने के बाद तय होगा कि वे इसरो में रहेंगे या वापस भारतीय वायुसेना में लौटेंगे. चौथे – ग्रुप कैप्टन अजित कृष्णन – अब भी वायुसेना में सक्रिय सेवा में हैं. इसरो ने अगले बैच के अंतरिक्ष यात्री चयन और प्रशिक्षण के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है. गगनयान कार्यक्रम की घोषणा के सात साल बाद भी यह काम आगे नहीं बढ़ा है.
क्रू मॉड्यूल – अब भी काम चल रहा है
क्रू मॉड्यूल गगनयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसे अनुभवी टेस्ट पायलटों की सलाह से बनाया गया है. शुभांशु शुक्ला और बालकृष्णन नायर ने स्पेसएक्स ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट पर ट्रेनिंग ली थी. उन्होंने कॉकपिट डिजाइन में सुझाव दिए. इंजीनियर और क्रू के बीच यह सहयोग अच्छा है. लेकिन मॉड्यूल को अब भी बहुत सख्त परीक्षणों से गुजरना है – जैसे अबॉर्ट सिनेरियो और लंबे समय तक सिमुलेशन.
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हाल ही में एयर-ड्रॉप टेस्ट किया गया. इसमें पैराशूट और डीसेलेरेशन सिस्टम की जांच हुई. लेकिन सबसे जरूरी डेटा तो बिना-क्रू उड़ानों से ही मिलेगा, जो अभी तक तय नहीं हुई हैं.
गगनयान कार्यक्रम के शुरुआती दिनों में इसरो नियमित अपडेट देता था. इससे लोगों में उत्साह बढ़ता था. लेकिन पिछले कुछ महीनों में सूचना बिल्कुल कम हो गई है. मिशन की प्रगति, तकनीकी मील के पत्थर और समयसीमा पर कोई खबर नहीं आ रही. इसरो के नेतृत्व को पूछे गए सवालों का जवाब नहीं मिल रहा. वरिष्ठ अधिकारी चेयरमैन के ऑफिस से अनुमति के बिना कुछ नहीं बोल रहे.

यह सिर्फ जनसंपर्क की समस्या नहीं है. इससे जवाबदेही और योजना बनाने पर असर पड़ता है. नासा ने आर्टेमिस-2 मिशन के बारे में हर छोटी-बड़ी बात – देरी, तकनीकी गड़बड़ी, मिशन की जानकारी और यहां तक कि अंतरिक्ष यात्रियों के सोने का भी – सार्वजनिक की. इससे लोगों का समर्थन बढ़ा. इसरो को भी इसी तरह खुलकर बात करनी चाहिए.
2027 का लक्ष्य बहुत मुश्किल
सारी बातों को जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ है. बिना-क्रू उड़ानें अभी तक नहीं हुईं. लॉन्च शेड्यूल रुका हुआ है. विकास की रफ्तार धीमी है. टीम तैयार नहीं है. सूचना भी नहीं मिल रही. इन सबके बावजूद अगर 2027 में क्रूड लॉन्च करना है तो दो बिना-क्रू उड़ानें, उनका विश्लेषण, सुधार और फिर इंसान वाली उड़ान – सब कुछ अगले एक साल में करना होगा. पर ये सब इतनी जल्दी होगा कैसे क्योंकि इसके बहुत तेज रफ्तार चाहिए.
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भारत की मानव अंतरिक्ष यात्रा की महत्वाकांक्षा सही है. गगनयान सिर्फ तकनीकी छलांग नहीं, बल्कि दुनिया के मंच पर भारत की इच्छाशक्ति का बयान है. लेकिन महत्वाकांक्षा के साथ-साथ उसे पूरा करने की क्षमता भी होनी चाहिए. अप्रैल 2026 की स्थिति में 2027 का लक्ष्य बहुत कठिन नजर आ रहा है.
देरी होना निराशाजनक जरूर होगा, लेकिन सुरक्षा के लिए जरूरी भी है. मानव अंतरिक्ष यात्रा में गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती. इसरो की सावधानी हाल की असफलताओं के बाद समझदारी भरी है. आर्टेमिस-2 की सफलता बताती है कि ऐसे मिशन सालों की कड़ी मेहनत, बार-बार परीक्षण और धैर्य से बनते हैं.
गगनयान का रास्ता अभी खुला है, लेकिन पहले सोचा गया था उससे ज्यादा लंबा है. इसरो को जल्दी ही अपनी कम्युनिकेशन रणनीति पर फिर से सोचना चाहिए ताकि लोगों का विश्वास बना रहे.
(इस कहानी के लिए इसरो चेयरमैन के दफ्तर में कुछ सवाल भेजे गए हैं, जिसका जवाब अभी तक नहीं आया है, जवाब मिलने पर कहानी को अपडेट किया जाएगा.)
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