कोई बारूद नहीं, कोई धमाका नहीं, कोई आवाज नहीं. फिर भी वियतनाम युद्ध और दूसरे संघर्षों में सैनिक इसे देखकर कांप जाते थे. इसका नाम था लेजी डॉग. हवा से हजारों की संख्या में गिराए जाने वाले ये छोटे-छोटे स्टील के तीर 805 किलोमीटर प्रति घंटे से भी तेज रफ्तार से नीचे गिरते थे. ये सीधे हेलमेट, गाड़ियों की छत और कंक्रीट के बंकर को भी चीरकर निकल जाते थे. सैनिक कुछ सुनते तक नहीं थे. अचानक आसपास के लोग गिरने लगते थे और खून से लथपथ हो जाते थे.

लेजी डॉग दरअसल एक तरह का काइनेटिक हथियार था. इसमें कोई विस्फोटक नहीं होता था. सिर्फ ठोस स्टील का बना छोटा-सा डार्ट या तीर होता था, जिसका वजन लगभग 453 ग्राम से 907 ग्राम के बीच होता था. विमान से ऊंचाई पर से इसे छोड़ा जाता था. हवा में गिरते समय यह घूमता हुआ और सीटी की तरह आवाज करता हुआ नीचे आता था, लेकिन इतनी तेज गति से कि जमीन पर पहुंचने से पहले सैनिकों को उसकी आवाज सुनाई नहीं देती थी.

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गुरुत्वाकर्षण और हवा के रुकावट के कारण यह 805 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार पकड़ लेता था. इस तेजी की वजह से यह किसी बुलेट की तरह घुस जाता था. कोई धमाका नहीं, सिर्फ छेद करके निकल जाना. एक विमान से हजारों ऐसे डार्ट एक साथ गिराए जाते थे, जिससे पूरा इलाका मौत का जाल बन जाता था.

(स्रोत: आर्मरएक्सप्रेस YT)

सैनिकों के लिए यह सबसे बड़ा खतरा क्यों था?

सैनिकों को इस हथियार से सबसे ज्यादा डर लगता था क्योंकि इसमें कोई चेतावनी नहीं होती थी. बम गिरने पर धमाके की आवाज सुनकर लोग छिप जाते थे, लेकिन लेजी डॉग बिना किसी आवाज के आता था. अचानक एक साथ कई साथी गिरने लगते थे. हेलमेट पहनने के बावजूद सिर फट जाता था.

ट्रक की छत या बंकर की दीवार भी इसे रोक नहीं पाती थी. कई बार सैनिक सिर्फ अपने साथी को गिरते देखकर समझ पाते थे कि हमला हुआ है. इसकी मारक क्षमता इतनी ज्यादा थी कि छोटे-छोटे जंगल या खुले मैदान में छिपे दुश्मन को भी मार गिराती थी. कोई विस्फोट नहीं होने से आग भी नहीं लगती थी, सिर्फ मौत फैल जाती थी.

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द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिकी सेना ने इस हथियार को विकसित किया था. बाद में वियतनाम युद्ध में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ. अमेरिकी विमान F-4 फैंटम और दूसरे हमलावर विमानों से हजारों लेजी डॉग गिराए जाते थे. एक हमले में 10 हजार से ज्यादा डार्ट गिराए जा सकते थे.

इससे दुश्मन की छिपी हुई टुकड़ियों पर भारी नुकसान होता था. बाद में इस हथियार को आधुनिक फ्लेचेट बमों में बदल दिया गया, लेकिन मूल आइडिया वही रहा – बिना बारूद के सिर्फ गति से मारना. आज भी कुछ देशों की सेना में ऐसे काइनेटिक हथियारों का अध्ययन चल रहा है.

लेजी डॉग हमें याद दिलाता है कि युद्ध में हमेशा बड़े बमों की जरूरत नहीं होती. कभी-कभी साधारण दिखने वाला हथियार सबसे खतरनाक साबित होता है. आज ड्रोन और स्मार्ट मिसाइलों के जमाने में भी काइनेटिक हथियारों का इस्तेमाल बढ़ रहा है क्योंकि ये सस्ते, आसान और पता लगाने में मुश्किल होते हैं. लेजी डॉग की कहानी सैनिकों की वह डरावनी याद है जब वे बिना किसी आवाज के मौत का इंतजार करते थे.

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