‘रोबोट को खून नहीं निकलता’, साइंस और एक्सपेरिमेंट की बदौलत यूक्रेन कैसे बदल रहा है बैटलफील्ड? – Ukraine robot army Russia war battle field drone warfare ntcppl


पिछले चार सालों से रूस के साथ जंग लड़ रहे यूक्रेन ने बैटलफील्ड की तस्वीर ही बदल दी है. यूक्रेन की ओर से अब सैनिक के रूप में इंसान नहीं बल्कि मशीनी मानव जंग क्षेत्र में दिखते हैं. कैटरपिलर ट्रैक्स, ऑफ-रोड टायरों वाले ये रोबोट सैनिक विज्ञान की भाषा में Unmanned Ground Vehicles – UGVs कहे जाते हैं. ये मुख्य रूप से  छोटे-मध्यम आकार के मशीनी वाहन होते हैं जो इंसानी सैनिकों की जगह खतरनाक मिशनों पर जाते हैं. इन रोबोट सैनिकों ने वॉर का गेम ही बदल दिया है, यूक्रेन का अनुभव तो कम से कम ऐसा ही है.

हाल ही में जब सरेंडर की मुद्रा में चलते हुए दो रूसी सैनिकों ने यूक्रेनी रोबोट्स और ड्रोन के सामने सरेंडर किया तो ये खबर दुनिया भर में सुर्खियां बनीं. इस रोबोट्स को एक ऐसा शख्स ऑपरेट कर रहा था जो फ्रंट लाइन से मीलों दूर था.

दरअसल ये भविष्य की लड़ाइयों की छोटी सी झलकी है. यूक्रेन के इस वॉर ट्रांसफॉर्मेशन पर सीएनएन ने एक रिपोर्ट जारी की है.

इस मिशन को अंजाम देने वाली यूक्रेनी यूनिट के कमांडर मिकोला मकार जिनकेविच ने कहा, “यह जगह बिना एक भी गोली चलाए कब्ज़े में ले ली गई.”

जिनकेविच यूक्रेन की तीसरी अलग असॉल्ट ब्रिगेड की “NC13″ यूनिट में काम करते हैं और जमीन पर आधारित रोबोटिक स्ट्राइक सिस्टम संभालते हैं. उन्होंने कहा कि पिछली गर्मियों में हुआ यह ऑपरेशन इतिहास में पहली बार था जब किसी दुश्मन की जगह पर जमीन पर चलने वाले रोबोट और ड्रोन की मदद से हमला किया गया और सैनिकों को पकड़ा गया. इस ऑपरेशन में पैदल सेना की कोई भूमिका नहीं थी.”

कैसे होते हैं रोबोटिक सैनिक

मूवमेंट के लिए UGV ज्यादातर कैटरपिलर ट्रैक्स इस्तेमाल करते हैं, जो दिखने में टैंक जैसी होती है. या फिर इन्हें बड़े टायरों पर इंस्टॉल किया जाता है. इससे ये खाइयों, जंगलों और खेतों में आसानी से गुजरते हैं.

इनके ऊपरी हिस्सों पर कई कैमरे (थर्मल सहित), रिमोट कंट्रोल एंटेना और सेंसर लगे होते हैं, ताकि ऑपरेटर दूर से कंट्रोल कर सके.

अगर इन रोबोट्स को हथियारों से लैस करने की बात की जाए तो इनमें 12.7mm तक का मशीनगन, ग्रेनेड लॉन्चर, एंटी-टैंक माइन्स या एक्सप्लोसिव पेलोड वाली टॉरेट यानी की घूमने वाली बंदूक लगी होती है.

इसके अलावा इन रोबोटिक सैनिकों में सामान, गोला-बारूद, घायल सैनिक निकालने के लिए कैप्सूल या कैरियर बॉक्स भी होता है.

यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने मंगलवार को दावा किया कि पिछले तीन महीनों में ही ड्रोन और रोबोट ने 22000 से ज़्यादा मिशन पूरे किए हैं. इनकी वजह से 22000 से ज़्यादा बार जानें तब बचीं जब किसी सैनिक के बजाय एक रोबोट को सबसे खतरनाक इलाकों में भेजा गया.

कंट्रोल कैसे होता है

यूक्रेन के रोबोट सैनिकों को मुख्य रूप से रिमोट के जरिये कंट्रोल किया जाता है. ऑपरेटर कई किलोमीटर दूर सुरक्षित बंकर, शेल्टर या मोबाइल कमांड स्टेशन से रोबोट को नियंत्रित करते हैं. एक सैनिक को सिर्फ 1-2 हफ्ते या 1 महीने तक ट्रेनिंग देकर उन्हें एक्सपर्ट बनाया जा सकता है.

एक ऑपरेटर रोबोट की ड्राइविंग, दूसरा टॉरेट/गन कंट्रोल कर सकता है, या एक ही व्यक्ति दोनों संभाल सकता है.

रोबोट से संपर्क साधने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी, स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट, फाइबर-ऑप्टिक केबल या एरियल रिले ड्रोन्स का इस्तेमाल किया जाता है. रोबोट पर लगे मल्टीपल कैमरे लाइव वीडियो फीड भेजते हैं.

ऑपरेटर स्क्रीन पर फॉरवर्ड, रियर और टॉरेट व्यू देखकर रोबोट चलाता है गन घुमाता है और फायर करता है.

रोबोट आर्मी के ज्यादातर मिशन में पूर्ण रूप से रिमोट पायलटिंग होती है. ऑपरेटर हर मूवमेंट कंट्रोल करता है.

आखिरी फैसला इंसान ही लेगा

रोबोटिक आर्मी जंग में जरूर कमाल दिखा रही है लेकिन जिनकेविच को इस बात का पक्का यकीन नहीं है कि युद्ध के मैदान में पूरी तरह से ऑटोनॉमस टेक्नोलॉजी की कोई जगह है.

उन्होंने कहा, “आखिरी फैसला हमेशा इंसान को ही लेना चाहिए.” “क्या आप हथियार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भरोसे छोड़ देंगे? हम कैसे पक्का कह सकते हैं कि वह दोस्त और दुश्मन में फ़र्क कर पाएगा? हम कैसे पक्का कह सकते हैं कि कोई खराबी नहीं आएगी या कुछ गलत नहीं होगा?”

जिनकेविच ने कहा कि पिछले चार सालों में उन्होंने जो तकनीकी तरक्की देखी है, उसे देखकर वे लगातार हैरान होते रहे हैं.

उन्होंने कहा, “अगर 2022 में मैंने खुद को इस तरह बोलते सुना होता तो मैं कहता कि कोई पागल आदमी बात कर रहा है. यह सब तो बस साइंस फ़िक्शन था.”

लेकिन अब वे पूरी तरह से इसके साथ हैं. वे कहते हैं, “इंसान की जिंदगी अनमोल है, जबकि रोबोट को चोट लगने पर खून नहीं निकलता. इसी आधार पर मेरा मानना ​​है कि रोबोटिक ग्राउंड सिस्टम को बहुत तेज़ी से बहुत बड़े पैमाने पर विकसित करने की ज़रूरत है और युद्ध के मैदान में इस्तेमाल के लिए इसे एक ग्लोबल सिस्टम के तौर पर लागू किया जाना चाहिए.”

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