अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव में एक नया मोड़ आ गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जहां सीजफायर बढ़ाने का ऐलान किया, वहीं ईरान ने इसे साफ तौर पर ठुकरा दिया. तेहरान का कहना है कि वह इस “एकतरफा फैसले” को नहीं मानता और अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से ही आगे कदम उठाएगा.
ईरानी संसद स्पीकर के सलाहकार महदी मोहम्मदी ने भी ट्रंप के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, “ट्रंप का सीजफायर एक्सटेंशन कोई मायने नहीं रखता. हारने वाले शर्तें नहीं थोप सकते.” यह बयान साफ दिखाता है कि ईरान इस पूरे मामले में झुकने के मूड में नहीं है.
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लेकिन यहां दिलचस्प बात ये है कि बयान भले ही टकराव वाले हों, जमीन पर हालात कुछ और ही कहानी बता रहे हैं. न तो बड़े स्तर पर हमले हो रहे हैं, न ही हालात पूरी तरह बिगड़े हैं. जहाज अब भी तय रास्तों से गुजर रहे हैं, और सैन्य गतिविधियां सीमित नजर आ रही हैं. यानी दोनों देश अलग-अलग बातें कह रहे हैं, लेकिन व्यवहार में एक तरह का सीजफायर जैसा माहौल बना हुआ है.
इसे ऐसे समझ सकते हैं कि यह ऐसा दौर है जहां कोई भी खुलकर पीछे नहीं हटना चाहता, लेकिन पूरी तरह आगे बढ़कर टकराव भी नहीं कर रहा. इस बीच, अमेरिका ने सीजफायर बढ़ाने की वजह भी बताई है. उनका कहना है कि ईरान की सरकार के अंदर अलग-अलग राय हैं और एक साथ फैसला लेना आसान नहीं है. ऐसे में पाकिस्तान को और समय दिया जा रहा है ताकि वह दोनों पक्षों के बीच एक ठोस प्रस्ताव तैयार कर सके.
हालांकि, बातचीत को लेकर भी तस्वीर साफ नहीं है. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का इस्लामाबाद दौरा भी रद्द हो गया है. वहीं ईरान ने भी साफ कर दिया कि वह तय समय पर अपने प्रतिनिधि नहीं भेजेगा. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को “एक्ट ऑउ वॉर” बताया और कहा कि यह खुद सीजफायर का उल्लंघन है.
दूसरी तरफ ट्रंप ने साफ कहा है कि अगर समझौता नहीं हुआ, तो बमबारी फिर शुरू हो सकती है. उन्होंने कहा कि वह बातचीत चाहते हैं, लेकिन जरूरत पड़ी तो सख्त कदम उठाने में पीछे नहीं हटेंगे. मसलन, उनको लेकर ये आम राय बनती जा रही है कि वह अपने देश की जनता को बातचीत का भरोसा दिला रहे हैं लेकिन असल में जमीनी हालात ठीक नहीं हैं.
इस पूरे विवाद में होर्मुज स्ट्रेट और न्यूक्लियर प्रोग्राम सबसे बड़े मुद्दे बने हुए हैं. अमेरिका चाहता है कि इस अहम समुद्री रास्ते से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सामान्य हो जाए, जबकि ईरान इसे दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है. ईरान की अपनी शर्तें भी हैं. वह चाहता है कि अमेरिका उसका नौसैनिक ब्लॉकेड हटाए और इजरायल-हिज्बुल्लाह के बीच लड़ाई पूरी तरह खत्म हो.
आसान भाषा में कहें तो दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह पर अड़े हुए हैं. कोई खुलकर पीछे नहीं हटना चाहता, लेकिन हालात ऐसे हैं कि पूरी तरह लड़ाई भी नहीं छेड़ी जा रही. यानी फिलहाल यह एक ऐसा दौर है, जहां कागज पर सीजफायर नहीं है लेकिन जमीन पर गोलीबारी भी नहीं हो रही. अब देखना यह है कि यह स्थिति बातचीत तक पहुंचती है या फिर फिर से टकराव बढ़ता है.
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