पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान ने इस बार चुनावी पंडितों और राजनीतिक दलों को हैरान कर दिया है. पहले चरण में मतदान का जो आंकड़ा सामने आया है, उसने पिछले सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं. 152 सीटों पर 92 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज हुआ, जो अंतिम आंकड़ों में 93 प्रतिशत तक जा सकता है.

अगर ऐसा होता है तो यह 2021 के विधानसभा चुनाव के पहले चरण के 83.2 प्रतिशत मतदान से करीब 10 प्रतिशत ज्यादा होगा. यही बढ़ी हुई वोटिंग अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन गई है कि क्या यह दीदी के पक्ष में गया या दिल्ली यानी बीजेपी के लिए अवसर बन रहा है?

पिछले 45 विधानसभा चुनावों में जहां भी मतदान प्रतिशत पिछली बार से कम रहा या पिछली बार जितनी ही मतदान हुआ, वहां ज्यादातर राज्यों में मौजूदा सरकार को फायदा मिला. जैसे मध्य प्रदेश में मतदान प्रतिशत 75 से 76 प्रतिशत हुआ और वहां बीजेपी की सरकार बरकार रही. उत्तर प्रदेश में 61 प्रतिशत मतदान जब 60 प्रतिशत रह गया, तब वहां भी बीजेपी वापसी करने में कामयाब हुई. और गोवा में भी जब 4 प्रतिशत मतदान कम हुआ, तब वहां भी बीजेपी की सरकार ने वापसी की.

इसमें कुछ अपवाद भी रहे हैं. छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और पंजाब जैसे राज्यों में या तो एक-दो प्रतिशत कम मतदान होने पर भी सरकारें बदल गईं या एक-दो प्रतिशत ज्यादा मतदान होने पर भी सरकारें बदल गईं. हालांकि बिग पिक्चर में देखें तो वोटिंग पैटर्न कहता है कि जब 7 प्रतिशत या उससे ज्यादा मतदान हो जाए तो इसके दो मतलब होते हैं. या तो जनता मौजूदा सरकार को पूरी ताकत के साथ वापस लाना चाहती है या मौजूदा सरकार को पूरी ताकत के साथ हटाना चाहती है. ऐसे वोटिंग पैटर्न में चुनाव फंसते नहीं हैं. बल्कि ऐसे वोटिंग पैटर्न में चुनाव स्पष्ट और आर-पार के बन जाते हैं.

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16 जिलों में कहां हुई कितने प्रतिशत वोटिंग

पश्चिम बंगाल में गुरुवार को 16 जिलों की 152 सीटों पर वोटिंग हुई, जिनमें 12 जिलों में मतदान प्रतिशत 90 प्रतिशत या उससे ज्यादा रहा. इनमें भी सबसे ज्यादा वोटिंग दक्षिण दिनाजपुर में हुई, जहां 94.4 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले. यानी आप ऐसे समझिए कि दक्षिण दिनाजपुर में हर 100 में से लगभग 95 वोटर्स मतदान केंद्रों पर अपना वोट डालने आए. दक्षिण दिनाजपुर में कुल 6 विधानसभा सीटें आती हैं, जहां मुसलमानों की आबादी लगभग 25 प्रतिशत है और हिंदुओं की आबादी 73.5 प्रतिशत है. यानी जिन सीटों पर हिन्दू वोटर्स निर्णायक हैं, उस जिले में सबसे ज्यादा मतदान हुआ है.

दक्षिण दिनाजपुर के बाद कूचबिहार जिले में 94 प्रतिशत मतदान हुआ है, बीरभूम में 93.2 प्रतिशत, जलपाईगुड़ी में 92.7 प्रतिशत और मुर्शिदाबाद ज़िले में भी लगभग इतना ही 92.7 प्रतिशत मतदान हुआ है. मुर्शिदाबाद में पश्चिम बंगाल की 22 विधानसभा सीटें आती हैं. और इस जिले में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं. यहां मुसलमानों की आबादी 65 प्रतिशत से ज्यादा है जबकि हिन्दुओं की आबादी सिर्फ 33 प्रतिशत है और अब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की टीएमसी इस जिले में सबसे मजबूत थी. लेकिन अब हुमायूं कबीर उनके लिए चुनौती बन गए हैं.

क्या टीएमसी के लिए चुनौती बनेंगे हुमायूं कबीर?

हुमायूं कबीर वही नेता हैं, जो मुर्शिदाबाद में बाबरी जैसी मस्जिद बनवा रहे हैं और उन्होंने अपनी अलग पार्टी से चुनाव लड़ा है. अगर हुमायूं कबीर मुस्लिम वोटों का विभाजन करते हैं तो यहां मुर्शिदाबाद की कम से कम 13 सीटों पर समीकरण बदल जाएंगे. और हुमायूं कबीर और TMC की लड़ाई में बीजेपी को यहां फायदा हो सकता है. अब हुमायूं कबीर कैसे मुर्शिदाबाद में असर डाल सकते हैं, उसके लिए इन आंकड़ों पर गौर करना जरूरी है.

हुमायूं कबीर रेजीनगर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, जहां 2021 में 85.5 प्रतिशत मतदान हुआ था, लेकिन इस बार यहां 91.2 प्रतिशत वोटिंग हुई है. हुमायूं जिस दूसरी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, उसका नाम है नौदा. इस सीट पर पिछली बार 86.2 प्रतिशत मतदान हुआ था, लेकिन इस बार यहां भी 93 प्रतिशत मतदान हो चुका है. अब मुर्शिदाबाद में सारा खेला इसी बात पर टिका है कि हुमायूं ममता बनर्जी के मुस्लिम वोट बैंक में कितनी सेंध लगाते हैं और इसका बीजेपी को भी कितना फायदा मिलता है.

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पहले चरण की सीटों पर हिंदू-मुस्लिम वोटर्स का समीकरण

पहले चरण के मतदान की एक और खास बात ये है कि जिन सीटों पर सबसे ज्यादा मतदान हुआ है, उनमें ज्यादातर सीटें मिक्स हैं. यानी इन सीटों पर मुसलमान भी बहुसंख्यक हैं और हिन्दू भी बहुसंख्यक हैं. जैसे मुर्शिदाबाद की भगवान गोला सीट पर 96.5 प्रतिशत मतदान हुआ, जहां 85 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है. सिर्फ 14.2 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है.

इसके बाद रघुनाथगंज में 96.3 प्रतिशत मतदान हुआ है और ये सीट भी मुर्शिदाबाद में आती है, जहां 80 प्रतिशत वोटर्स मुस्लिम हैं. मुर्शिदाबाद की ही लालगोला सीट पर 96 प्रतिशत मतदान हुआ है, यहां भी हिन्दू अल्पसंख्यक हैं और मुसलमानों की आबादी 80 प्रतिशत से ज्यादा है. फरक्का सीट पर 95.7 प्रतिशत मतदान हुआ है, जहां मुस्लिम आबादी 67 प्रतिशत है और हिंदू आबादी 32 प्रतिशत है. जबकि जंगीपुर सीट पर 94.8 प्रतिशत मतदान हुआ है, जहां 62 मुस्लिम आबादी और 37 प्रतिशत हिंदू आबादी है.

जिन सीटों पर हिन्दू बहुंख्यक हैं, उन सीटों पर भी बंपर वोटिंग हुई है लेकिन मुस्लिम सीटों के मुकाबले हिन्दू बहुल सीटों में औसतन 2 से 2 प्रतिशत वोटिंग कम हुई है. और इसी में पहले चरण की वोटिंग का पूरा नतीजा छिपा है. यहां एक सवाल ये भी है कि क्या इस बंपर वोटिंग से बीजेपी के चांस बढ़ गए हैं? क्योंकि बीजेपी अब तक ये आरोप लगाती थी कि टीएमसी के डर से बहुत सारे लोग चुनावों में भयमुक्त होकर यानी बिना डरे वोट नहीं डालते थे.

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भयमुक्त वोटिंग का बीजेपी को मिलेगा फायदा?

लेकिन इस बार जिस तरह से केन्द्रीय सुरक्षा बलों के 2 लाख 40 हज़ार जवानों की तैनाती की गई और ज्यादातर सीटों पर वोटिंग शांत रही, उससे ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या बड़ी संख्या में जो लोग वोट डालने के लिए निकले, उन्होंने भयमुक्त वोटिंग की. और अगर ये भयमुक्त वोटिंग है तो क्या बीजेपी को इसका फायदा मिलने वाला है?

इस बार बंगाल की चुनावी सुबह पिछले कई चुनावों से अलग थी. छिटपुट नोकझोंक को छोड़ दें, तो बवाल का शोर लगभग गायब था. न बमों के धमाके हुए, न बूथ कैप्चरिंग की दहशत. चुनाव आयोग ने बंगाल को एक छावनी में तब्दील कर दिया और 2 लाख 40 हजार केंद्रीय बलों ने वो मुमकिन कर दिखाया, जो अब तक नामुमकिन लगता था. इससे पिछले चुनावों में हिंसा बड़े पैमाने पर होती आई है. पिछले विधानसभा चुनाव में 1300 हिंसक घटनाएं हुई थीं और 17 लोग मारे गए थे. लेकिन इस बार घटनाएं सीमित हुईं. कई घटनाएं रोक ली गईं.

चुनावी गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा साइलेंट वोटर को लेकर है. जानकारों का मानना है कि जब वोटिंग बिना दबाव और बिना डर के होती है, तो ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ यानी सत्ता विरोधी लहर सबसे ज्यादा मुखर होती है. अगर बंगाल का आम नागरिक बिना किसी हिचकिचाहट के बटन दबा रहा है, तो समझ लीजिए कि बंगाल की सियासत करवट ले रही है. हालांकि, क्या ये लहर बीजेपी को बहुमत के जादुई आंकड़े तक ले जाएगी? ये सस्पेंस 4 मई को ही खुलेगा.

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गौरतलब है कि साल 2021 में बीजेपी 77 सीटों पर सिमट गई थी, तब हिंसा और डर एक निर्णायक फैक्टर माना गया. लेकिन 2026 के इस पहले चरण ने तस्वीर साफ कर दी है कि बंगाल की जनता ने या तो बदलाव को चुना है या फिर एक प्रचंड समर्थन को. सुरक्षाबलों की तैनाती ने बीजेपी को वो लेवल प्लेइंग फील्ड मुहैया करा दिया है, जिसकी वो सालों से गुहार लगा रही थी. अब सवाल बस एक है कि क्या दीदी का अभेद्य किला ढहने वाला है या बीजेपी की उम्मीदें एक बार फिर सत्ता की दहलीज पर आकर ठहर जाएंगी?

पिछले चुनावों में बीजेपी को 77 सीटों पर जीत मिली थी जबकि टीएमसी 215 सीटों पर जीती थी. अगर पिछली बार के इन चुनावी नतीजे को पलटना है तो बीजेपी को इस बार लगभग 100 सीटें ज्यादा जीतनी होंगी. और इन 100 सीटों के लिहाज से पहले चरण का चुनाव बहुत अहम हो जाएगा. कारण, पहले चरण में पश्चिम बंगाल के 16 जिलों की 152 सीटों पर वोटिंग हुई है, जिनमें से पिछली बार बीजेपी ने 59 और टीएमसी ने 92 ने जीती थीं.

अगर बीजेपी बड़ा उलटफेर करती है और इस बार उसे 92 सीटें मिलती हैं और टीएमसी को 59 सीटें मिलती हैं तो बीजेपी 170 सीटों के आंकड़े तक पहुंच सकती है. ऐसा होने पर उसे पहले चरण में कम से कम 92 सीटें और दूसरे चरण की 141 सीटों में से 78 सीटें जीतनी होंगी. और इन दोनों को मिलकर 170 सीटों का आंकड़ा बनेगा. हालांकि ये बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा.

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