अमेरिका एक विफल राष्ट्र है, लगभग – donald trump america failed state constitution impeachment india china hellholes ntc agkp


राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी हाल ही में भारत और चीन को ‘नर्क’ (hellholes) की कैटेगरी में डाल दिया है. जरा उस व्यक्ति की ढिठाई देखिए जो ऐसे समय में यह कह रहा है जब उसने अकेले दम पूरी दुनिया को एक ‘नर्क’ में बदल दिया है. आजाद लोगों की दुनिया अब किसी ऐसे व्यक्ति का इंतजार कर रही है जो उन्हें आजाद करा सके इस एक शख्स से- डोनाल्ड जे ट्रंप!

1990 के दशक के सोमालिया या यमन जैसे देशों का अध्ययन करने वाले पॉलिटिकल साइंटिस्ट एक विफल देश के कुछ क्लासिक लक्षण बताते हैं: वैध सत्ता का खत्म होना, ताकत का सही इस्तेमाल न कर पाना, आपस में लड़ते गुट, इंस्टीट्यूशंस के प्रति जनता के भरोसे का टूटना और बुनियादी सुविधाएं देने में नाकामी. अमेरिका फिलहाल किसी गृहयुद्ध या आर्थिक बर्बादी से ग्रसित नहीं है. लेकिन राजनीतिक और संस्थागत सड़न पूरी तरह से दिखाई दे रही है.

शुरुआत संवैधानिक मशीनरी से करते हैं. एक चलते-फिरते लोकतंत्र में, कांग्रेस, अदालतें और संविधान को जनता की अंतरात्मा के प्रहरी के रूप में काम करना चाहिए, जो शालीनता लेकिन मजबूती से कह सकें: “हमारी मर्जी के बिना नहीं.”

युद्ध की औपचारिक घोषणा और कांग्रेस की मंजूरी के बिना ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ शुरू कर दिया गया. वो हवाई हमले जिसमें अली खामेनेई को निशाना बनाया गया और ईरान के साथ दो महीने से चल रही जंग शुरू हुई. ट्रंप ने इसका आदेश एयर फोर्स वन से दिया. लक्ष्य अब भी अधूरे हैं. ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब भी चल रहा है. रिजीम चेंज सिर्फ अयातुल्ला के बदलने के साथ रुक गया. हिजबुल्ला और हूती अब भी हमले कर रहे हैं. रिपब्लिक को अपमान से बचाने वाली संवैधानिक मशीनरी काम ही नहीं कर पाई.

इसके बाद आता है – गुटों में बंटा एलीट वर्ग और टूटती हुई कैबिनेट. यह किसी देश के कमजोर होने का आम लक्षण है. फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने के बाद से कम से कम पांच बड़े अधिकारी या तो भाग खड़े हुए हैं या उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है: नौसेना सचिव जॉन फेलन को रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के साथ टेंशन के कारण हटा दिया गया. अटॉर्नी जनरल पेम बोंडी को हटा दिया गया. लेबर सेक्रेटरी लोरी शावेज़-डेरेमर ने विवादों के बीच इस्तीफा दे दिया. होमलैंड सिक्योरिटी की क्रिस्टी नोएम चली गईं, और एक दर्जन से अधिक जनरलों और एडमिरलों को बाहर कर दिया गया. जिनमें आर्मी चीफ रैंडी जॉर्ज जैसे शीर्ष अधिकारी शामिल हैं.

ये सब हो रहा है एक ऐसी जंग के बीच, जो शायद तीसरा विश्वयुद्ध बन सकती है. सिचुएशन रूम में आने-जाने का ये सिलसिला ‘स्थिर प्रशासन’ की निशानी तो कतई नहीं है. ट्रंप की ‘A टीम’ बिखरी हुई है और उनकी ‘B टीम’ ने आग बुझाने के अभ्यास के दौरान ‘म्यूजिकल चेयर’ खेलने का फैसला किया है. अगला कौन होगा?

फिर आती है इंटरनेशनल कम्युनिटी में अन्य देशों के साथ बातचीत करने की अक्षमता. टैरिफ, धमकियों और ट्विटर (अब X) के नखरों से दुनियाभर के नेताओं को अपमानित करने की ट्रंप की सिग्नेचर स्टाइल रंग लाई है. कभी अमेरिका के दुःसाहसी एडवेंचर में साथ देने वाले नाटो सहयोगियों ने लक्ष्मण रेखा खींच दी है: “यह हमारी जंग नहीं है.” ईरान के मामले में पूरा यूरोप एकजुट है कि वो यूएस के साथ नहीं आएगा. वे न सेना दे रहे हैं, न अपना हवाई क्षेत्र और न ही उत्साह से हाथ मिला रहे हैं. ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे बड़े साझेदारों ने मदद की अपील को ठुकरा दिया है और ट्रंप की धौंस को नजरअंदाज कर दिया है. पुराने सहयोगी अब अमेरिका को एक पार्टनर से ज्यादा एक खतरे के रूप में देखते हैं.

ट्रंप की “हम अकेले काफी हैं” वाली बयानबाजी ने अमेरिका को अलग-थलग कर दिया है. वह मदद मांग रहा है, जबकि चीन किनारे बैठकर मुस्कुरा रहा है और रूस खुश हो रहा है. आर्थिक ताकत और सुरक्षा के बावजूद, अमेरिका फिलहाल एक विफल देश जैसा दिखने लगा है. ओवल ऑफिस के उस मनमौजी शख्स पर लगाम लगाने और देश को इस अपमान से बचाने में संवैधानिक चेक्स एंड बैलेंस नाकाम रहे हैं.

यह पूरी तरह से पतन नहीं है. अस्थायी ही सही, अगले चुनाव या मिडटर्म्स सिस्टम को एक ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’ की तरह रीबूट कर सकते हैं. लेकिन इस नाटकीय दौर में लक्षण कुछ और ही कह रहे हैं. जब सुरक्षा घेरे को जंग लग जाए, तो महाशक्तियां भी अपने ही जूतों के फीतों से उलझकर गिर सकती हैं. जो देश दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता था, वह अब सिखा रहा है कि क्या ‘नहीं’ करना चाहिए.

अमेरिका का संविधान एक शानदार दस्तावेज है. लेकिन, ऐसा लगता है कि यह उस व्यक्ति के सामने बेबस है जिसकी पहचान @realDonaldTrump के हैंडल से है. संविधान निर्माता अपनी तमाम प्रतिभाओं के बावजूद शायद यह क्लॉज डालना भुल गए कि: “यदि कोई अनियंत्रित रियलिटी टीवी होस्ट और रियल्टर दुनिया के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठ जाए, तो आपको क्या करना है.” उन्होंने इसके लिए कोई योजना ही नहीं बनाई थी.

दुनिया ने इसके लिए वोट नहीं दिया था, अमेरिकियों ने दिया था. फिर भी, इसकी कीमत दुनिया चुका रही है. ईरानी विदेश मंत्रालय ट्विटर रिफ्रेश कर रहा है कि यह जानने के लिए कि अमेरिका का रुख क्या है, क्योंकि नीतियां अब वहीं बनती हैं. डिप्लोमेसी अब पाकिस्तान के जरिए की जा रही है. जिस पाकिस्तान को अमेरिका खुद एक ‘टेरर प्रॉक्सी स्टेट’ कहता रहा है, उसे अब अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता के लिए चुना गया है.

ट्रंप के पाकिस्तान प्रेम ने भारत-अमेरिका संबंधों को पटरी से उतार दिया है, जिसे चार राष्ट्रपतियों ने मेहनत से बनाया था. अमेरिका की फर्स्ट फैमिली और उनके दोस्तों के ‘क्रिप्टो हितों’ ने अमेरिकी नीति को पाकिस्तान की ओर मोड़ दिया है. यानी राष्ट्रीय हित से ऊपर व्यक्तिगत हित.

ट्रंप के दावों को ईरान ने खारिज कर दिया कि वे किसी समझौते पर राजी हुए हैं. तेहरान ने बातचीत बीच में ही छोड़ दी. कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने गुमनाम रहकर माना कि ट्रंप के कमेंट्स नुकसानदेह थे, लेकिन वे उन्हें अगली सुबह फिर से पोस्ट करने से रोकने में लाचार थे. ईरान ने दूसरे दौर की बातचीत से भी मना कर दिया. पाकिस्तान में ईरानी राजदूत ने ट्वीट किया कि “यह एक सार्वभौमिक सत्य है” कि कोई भी स्वाभिमानी सभ्यता धमकी और दबाव में बातचीत नहीं करेगी.

यूरोप की हिचकिचाहट पर ट्रंप की प्रतिक्रिया वही थी जो हमेशा होती है: गुस्सा. उन्होंने ब्रिटेन और फ्रांस से कहा कि वे खुद जाकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से ईंधन ‘ले लें’ (TAKE IT) और चेतावनी दी कि “अमेरिका अब वहां आपकी मदद के लिए नहीं होगा.” यह ऐसे आदमी की विदेश नीति ही हो सकती है जिसने बहुत ज्यादा एक्शन फ़िल्में देख ली हों.

अमेरिका-अरब गठबंधन अब बिखराव की ओर है क्योंकि ट्रंप अपनी बातों को इंटरनेट पर जोर-जोर से कहने से खुद को रोक नहीं पाते. जब वॉर स्ट्रेटेजी धाराशायी हो रही है तो उनकी कैबिनेट भी ‘स्लो-मोशन’ वाली गिरावट दर्ज कर रही है. वॉर रूम में ‘रिवॉल्विंग डोर’ लगा है क्योंकि उन्होंने एक फॉक्स न्यूज़ प्रेजेंटर को अपना वॉर सेक्रेटरी बना दिया है.

उस राष्ट्रपति के लिए क्या प्रावधान है जिसका विवेक इतना अनिश्चित हो? संविधान के पास तीन रास्ते हैं:

महाभियोग (Impeachment): हाउस साधारण बहुमत से महाभियोग चलाता है, सीनेट दो-तिहाई से दोषी ठहराती है. ट्रंप को लेकर दो बार ये कोशिश हुई, दोनों बार फेल रही. बिना सीनेट के समर्थन के महाभियोग सिर्फ एक नाटक है, समाधान नहीं.

इलेक्शन: इस पर संविधान निर्माताओं को सबसे ज्यादा भरोसा था. लेकिन युद्ध और संकट चुनावी कैलेंडर के हिसाब से नहीं आते. नवंबर में मिडटर्म्स हैं. कहा जा रहा है डेमोक्रेट्स हाऊस पर फिर से काबिज हो जाएंगे. लेकिन उससे सिर्फ यह बदलेगा कि सदन में ‘माइक्रोफोन’ किसके पास रहेगा, ‘न्यूक्लियर कोड्स’ नहीं.

25वां संशोधन: यह तब इस्तेमाल होता है जब स्थिति वाकई चिंताजनक हो जाए. 1967 में कैनेडी की हत्या के बाद इसे लागू किया गया था. इसका सेक्शन 4 राष्ट्रपति को पद से हटाने की शक्ति देता है. यदि उपराष्ट्रपति और मैजोरिटी कैबिनेट यह लिखित में दें कि राष्ट्रपति अपनी जिम्मेदारी निभाने में अक्षम हैं. ऐसा होने पर उपराष्ट्रपति एक्टिंग प्रेसिडेंट बना दिए जाएंगे. लेकिन यह इतना आसान नहीं है. राष्ट्रपति पलटकर लिख सकता है कि वह ठीक है, और वह तुरंत अपनी शक्तियां वापस पा लेगा. फिर मामला कांग्रेस में जाएगा जहां उसे हटाने के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए होगा. आज जब अमेरिका दो धड़ों में बंट गया हे, ऐसा होना लगभग नामुमकिन है.

सबसे बड़ी समस्या यह है कि 25वां संशोधन राष्ट्रपति पद की ‘निरंतरता’ के लिए बना था, ‘करेक्शन’ के लिए नहीं. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि राष्ट्रपति हमेशा मौजूद रहे, न कि यह तय करना कि राष्ट्रपति समझदार या कूटनीतिक है या नहीं. यह संशोधन चुनावी ‘भूल’ को सुधारने के लिए तो बिल्कुल नहीं था.

दोबारा चुनते समय मतदाताओं को चिड़चिड़े स्वभाव, लापरवाही और बेकाबू अहंकार के बारे में पता था. लेकिन फिर भी चुना. 25वां संशोधन बिल्कुल अलग है महाभियोग से. जिसमें एक स्वस्थ राष्ट्रपति को उसकी भयंकर गलतियों के कारण हटाया जा सकता है. अदालतें राष्ट्रपति की फिटनेस के मामले में दखल नहीं देंगी. सेना अपने सिविलियन कमांडर के खिलाफ नहीं जाएगी. अंतरराष्ट्रीय समुदाय का इसमें कोई दखल नहीं है. दुनिया, जो ट्रंप की हर पोस्ट और धमकी का खामियाजा भुगतती है, उसके पास न कोई वोट है, न वीटो.

संविधान, जो एक शानदार लेकिन बेबस दस्तावेज है, धैर्य से इस अपमान के अंत का इंतज़ार कर रहा है. दुनिया थोड़ा कम धैर्य के साथ इंतज़ार कर रही है.

(इंडिया टुडे वेबसाइट में प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद)

—- समाप्त —-



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *