दिल्ली शराब घोटाला केस: क्या जज को ‘कठघरे‘ में खड़ा कर पाए केजरीवाल? दोनों ओर से दिलचस्प दलीलें – kejriwal arguments delhi high court judge recusal liquor excise policy scam case ntcpmr


दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस (शराब घोटाला) में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपने केस की पैरवी की है. निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सीबीआई ने हाई कोर्ट में अपील की थी. केजरीवाल सुनवाई की शुरुआत में यह दलील देने की कोशिश कर रहे थे कि क्यों हाई कोर्ट जज स्वर्णकांता शर्मा को इस मामले से खुद को अलग कर लेना चाहिए. यानी, खुद को रिक्युज कर लें. हाई कोर्ट में इस पर डेढ़ घंटे दिलचस्प बहस हुई. अपनी डिमांड के पक्ष में केजरीवाल ने 10 कारण भी गिनाए.

जब अरविंद केजरीवाल ने रिक्युजल एप्लीकेशन में निजी तौर पर पेश होने का मौका देने के लिए आभार जताया, तो जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा, आपकी सेवा के लिए आए हैं.

अरविंद केजरीवाल ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की तारीफ करते हुए बड़ा वकील बताया, और सहयोगी की अपेक्षा जताई. यह बताते हुए कि वो पहली बार आए हैं.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने बोलीं, क्योंकि आप स्वयं जिरह कर रहे हैं… तो फिर आपको एक वकील के तौर पर जिरह करनी होगी. तब हर चीज के लिए… आपको मालूम ही है अदालत कैसे काम करती है. जस्टिस स्वर्णकांता ने सहयोग  की जगह आपसी सम्मान की सलाह दी.

“मैं आरोपी के तौर पर कठघरे में नहीं…”

अरविंद केजरीवाल: मैम, आज मैं आपके सामने किसी आरोपी की हैसियत से नहीं खड़ा हूं. मुझे बरी किया गया है. ऑनरेबली डिस्चार्ज्ड. और मैं एक-दो लाइनें केवल ट्रायल कोर्ट के …

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: मैंने कोई स्टे ऑर्डर नहीं दिया है.

अरविंद केजरीवाल: मैं मानता हूं मैम. मैं एक-दो लाइनें बस उस ऑर्डर में से पढ़ना चाहूंगा.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: नहीं, आप अभी सुनिए. अभी सिर्फ रिक्यूजल सुन रहे हैं हम.

अरविंद केजरीवाल: मैम, रिक्यूजल पर आ रहा हूं. बस एक मिनट.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: मिस्टर केजरीवाल, प्लीज … रिक्यूजल पर फोकस करते हैं.

अरविंद केजरीवाल: यही वजह है कि हम अदालत आए हैं. मैं उसी बात पर आ रहा हूं.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: आप कह सकते हैं कि इस पीठ को सुनवाई नहीं करनी चाहिए. यह ठीक है.

अरविंद केजरीवाल: मतलब प्लीज, प्लीज

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: लेकिन देखिए मिस्टर केजरीवाल, हम लोग रिक्यूजल पर आज सुन रहे हैं.

अरविंद केजरीवाल: रिक्यूजल पर ही आ रहा हूं मैं.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: सीधा ही आएंगे.

अरविंद केजरीवाल: मैं सीधा ही आ जाऊंगा रिक्यूजल पर, मैम थोड़ा सा बैकग्राउंड मुझे बताना पड़ेगा.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: मैं यह फाइल पढ़ चुकी हूं.

अरविंद केजरीवाल: मैम, आप पढ़ चुकी हैं… दो मिनट दे दीजिए, मुझे.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: सुनाइए.

“लेकिन, ये मेरी अदालत है…”

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: आपकी दलील क्या है? आप यह कहना चाह रहे हैं कि क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने सच बोला है इसलिए?

अरविंद केजरीवाल: नहीं मैम, मैं आ रहा हूं.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: मैं सिर्फ इस बात पर सुन रही हूं कि आपके मन में एप्रिहेंशन क्या है?

अरविंद केजरीवाल: मैं बता रहा हूं मैम.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: मैं सवाल करूंगी, आप वेट करेंगे, फिर जवाब देंगे.

अरविंद केजरीवाल: मैं जवाब दे रहा हूं.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: सवाल तो पूछने दो… मैं बार-बार एक ही रिक्वेस्ट कर रही हूं कि आज केवल रिक्यूजल पर सुन रही हूं. आपने जो आर्ग्युमेंट्स किए, ठीक हैं, कि आपके दिमाग में एप्रिहेंशन क्यों है? उस वक्त जब पहले वाले आदेश हुए, इस कोर्ट का फाइनल फैसला तो था नहीं. आज हम केवल आपके 10 बिंदुओं पर ध्यान देंगे. उसमें से मैंने आपके तीन बिंदु उठाए हैं.

अरविंद केजरीवाल: मैम, अभी पहला ही चल रहा है.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: नहीं, आपके हिसाब से पहला चल रहा है. अदालत, अदालती तरीके से चलती है. वो आप नहीं समझ पाएंगे. मगर मैं अपने तरीके से कोर्ट चलाती हूं. मैं ऐसे ही चलाऊंगी.

रिक्यूजल के लिए केजरीवाल की सबसे बड़ी दलील

अरविंद केजरीवाल: वकीलों की एक संस्था है- अधिवक्ता परिषद।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: यह बार नहीं है. बार एसोसिएशन की तरह, बार एसोसिएशन नहीं है. यह उनकी परिषद है.

अरविंद केजरीवाल: यह बीजेपी और आरएसएस वाले विचारों वाली संस्था है. उस संस्था के कार्यक्रम में माननीय न्यायालय चार बार जा चुकी हैं. 26 दिसंबर 2022, 17 मार्च 2023, 30 अगस्त 2024 और 8 अगस्त 2025. उनकी विचारधारा के हम सख्त खिलाफ हैं. यह राजनीतिक मामला है, मैम. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धारणा भी मायने रखती है, जैसे सीजर की पत्नी के मामले में कहा जाता है. जांच एजेंसी हर संदेह से ऊपर होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की आलोचना करते हुए उसे ‘पिंजरे का तोता’ कहा था. अगर सीबीआई राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार है, और अगर माननीय न्यायालय किसी विशेष विचारधारा के कार्यक्रमों में जाती हैं, तो मेरे मन में पक्षपात की आशंका पैदा होती है.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा (पूछती हैं): क्या मैं उनकी विचारधारा का पालन करती हूं?

अरविंद केजरीवाल: नहीं, मैं यह नहीं कह रहा… मैं कह रहा हूं कि संभव है आपकी उनके प्रति सहानुभूति हो. क्योंकि आप चार बार गई हैं.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: आपने जो दलील दी है, मैं वही लिखवाऊंगी. मैं आपसे पूछना चाहती हूं… जब मैं वहां गई थी तो मैंने कोई राजनीतिक बयान दिया है, मैंने कोई वैचारिक बयान दिया है या वह लीगल कार्यक्रम था?

अरविंद केजरीवाल: मेरे मन में यह भाव पैदा होता है. क्योंकि मैं विपरीत विचारधारा का हूं, तो क्या मुझे न्याय मिलेगा?

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा (डिक्टेशन देती हैं) : उनका कहना यह है कि यह अदालत अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित कुछ कार्यक्रमों में शामिल हुई है, जो एक विशेष विचारधारा का पालन करती है… इन्होंने विचारधारा स्पष्ट नहीं की है, बस लिखो कि किसी विचारधारा का पालन करती है.

केजरीवाल को संदेह कब और क्यों हुआ?

अरविंद केजरीवाल: सीबीआई और ईडी ने कहा कि ये सभी भ्रष्ट हैं, तो अदालत ने भी मान लिया कि ये सभी भ्रष्ट हैं. अब मैं 9 मार्च के आदेश पर आता हूं. 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट का आदेश आया. 11:30 बजे आदेश आया और 4 बजे तक सीबीआई ने 598 पन्नों की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर दी. 4 घंटे में 598 पन्ने कैसे दाखिल हो सकते हैं?

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: वे अपने काम में दक्ष हैं, बहुत बुद्धिमान हैं. मैं मानती हूं.

अरविंद केजरीवाल: उसमें हर आरोपी, हर आरोप और हर निष्कर्ष पर चर्चा थी. सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका में एक भी निष्कर्ष का प्रतिवाद नहीं किया गया था. उसे पहली सुनवाई में ही खारिज कर देना चाहिए था, लेकिन इतनी त्रुटिपूर्ण याचिका पर व्यापक एकपक्षीय आदेश पारित हो गया.

जज बिना किसी खास दखल के डिक्टेट करती हैं. अरविंद केजरीवाल की दलील रिकॉर्ड पर दर्ज हो जाती है. अरविंद केजरीवाल आगे कहते हैं.

अरविंद केजरीवाल: 9 मार्च के आदेश में लिखा गया कि प्रतिवादी अग्रिम सूचना के बावजूद उपस्थित नहीं हुए. हमें कोई अग्रिम सूचना नहीं मिली थी. 16 मार्च के आदेश में लिखा गया — उन्होंने उपस्थित न होने का विकल्प चुना. इससे थोड़ा दुख हुआ. हम क्यों उपस्थित न होने का विकल्प चुनेंगे? पिछले चार साल से आपके सामने सुनवाई चल रही है. एक भी मामला बता दीजिए जब हमने जानबूझकर अनुपस्थित रहने की कोशिश की हो.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: आप केवल बहस कीजिए.

जज लिखने के लिए कहती हैं, उनका कहना है कि इस अदालत ने आदेश में उल्लेख किया कि उन्होंने उपस्थित न होने का विकल्प चुना. उनका कहना है कि इस टिप्पणी से उन्हें ठेस पहुंची, क्योंकि वह पिछले चार वर्षों से इस अदालत के समक्ष तथा माननीय ट्रायल कोर्ट के समक्ष नियमित रूप से उपस्थित होते रहे हैं. उन्होंने कभी कोई सुनवाई नहीं छोड़ी.

हर बात सुने जाने का आश्वासन

अरविंद केजरीवाल: इस अदालत के पास MP/MLA रोस्टर 5 जनवरी को आया था. उसके बाद जितनी आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाएं दाखिल हुईं, हमने उनका विश्लेषण किया. जिस गति से यह मामला और एक दूसरा मामला चल रहा है, उस गति से बाकी कोई मामला नहीं चल रहा. मैंने रिक्यूजल आवेदन के पेज 31 पर कई मामलों की सूची लगाई है. ये दोनों मामले केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के प्रमुख राजनीतिक विरोधियों के हैं.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: तो आप राजनीतिक पक्षपात का इशारा कर रहे हैं, ठीक?

अरविंद केजरीवाल: नहीं, मैं ऐसा कोई इशारा नहीं कर रहा हूं, मैम.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: मुझे पहले स्पष्ट कर लेने दीजिए. फिर से लिखवाऊंगी. आपको ऐसा महसूस नहीं होगा कि मौका नहीं दिया गया. मैं आपकी बात सुनूंगी.

उसके बाद जज अरविंद केजरीवाल की कही हुई बातें रिकॉर्ड पर दर्ज कराती हैं.

केजरीवाल ने लिया अमित शाह का नाम

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: हां, प्लीज. कारण नंबर 10.

अरविंद केजरीवाल: कुछ दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी ने बयान दिया था कि केजरीवाल जी को हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: इस आशय की कोई लिखित दलील रिकॉर्ड पर नहीं है? मैं इसे देख लूंगी? आगे बढ़िए.

अरविंद केजरीवाल: उनका कहने का मतलब था कि मैं हाई कोर्ट में हारूंगा.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: वह क्या कहते हैं, उस पर क्या मेरा नियंत्रण है?

अरविंद केजरीवाल: मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि इस देश के गृह मंत्री ने ऐसा बयान दिया है.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: (डिक्टेशन देती हैं) उनका कहना है देश के गृह मंत्री ने किसी टीवी कार्यक्रम में यह बयान दिया कि जब इस अदालत का फैसला आएगा, तो श्री केजरीवाल को उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा. उनका कहना है कि इससे उनके मन में यह आशंका पैदा हुई है कि इस अदालत से उन्हें न्याय नहीं मिलेगा.

जजों के करीबियों का भी जिक्र

अरविंद केजरीवाल: सोशल मीडिया पर भी एक मुद्दा चल रहा है, मैम. पुरानी परंपरा थी कि अगर किसी जज के करीबी लोग किसी पक्ष या वकीलों से जुड़े होते थे, तो जज स्वयं को मामले से अलग कर लेते थे.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: क्या आप यह अपनी शपथपत्र वाली याचिका में लिख रहे हैं?

अरविंद केजरीवाल: मैं बोल देता हूं, मैम… उसी तरह के हितों का टकराव यहां दिखाई दे रहा है. मेरी माननीय अदालत से विनती है कि कृपया इस पर विचार किया जाए.

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा: (डिक्टेशन देती हैं) अदालत के समक्ष वह कहते हैं कि सोशल मीडिया सामग्री के कारण वह भी गहराई तक प्रभावित हैं, और उन्हें इस अदालत के प्रति पक्षपात की आशंका है, क्योंकि इस मामले में अदालत के हितों के टकराव का संकेत मिलता है. इसलिए उनके मन में, इन कारणों से अलग-अलग भी और सामूहिक रूप से भी, गहरा संदेह पैदा हुआ है कि उन्हें इस अदालत से न्याय नहीं मिलेगा. अतः यह अदालत खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर ले.

आखिर में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल से कहा, आपने बड़े अच्छे अंदाज में अपनी दलीलें रखी हैं. आपको तो वकील होना चाहिए.

अरविंद केजरीवाल का कहना था, मैं फिलहाल जो कर रहा हूं, उससे मैं बहुत खुश हूं.

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