आशा भोसले के निधन के बाद डॉक्टर ने इलाज को लेकर पोस्ट में उठाए ये सवाल, मेडिकल दुनिया में छिड़ी बहस – asha bhosle death passive euthanasia debate cpr in icu living will india sparks end of life debate tvist


बीते रविवार यानी 12 अप्रैल 2026 को बॉलीवुड से एक दुखभरी खबर सामने आई थी, जिसने न केवल स्टार्स को बल्कि पूरी दुनिया को झटका दिया. दरअसल, रविवार को 92 साल की उम्र में सुरों की मलिका आशा भोसले का निधन हो गया था, जिसने पूरे देश को गमगीन कर दिया. शनिवार (11 अप्रैल 2026) को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पलात में भर्ती किया गया था, जिसके बाद उन्होंने रविवार को अंतिम सांस ली.

आईसीयू में मौत: इलाज या तकलीफ?
आशा भोसले के गुजर जाने की खबर के बाद महाराष्ट्र के वर्धा स्थित MGIMS में मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ.एसपी कलानत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट करते हुए लिखा, ‘मुझे ये जानकर दुख हुआ कि आशा भोसले को मौत से पहले सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) दिया गया.

यूं तो आमतौर पर आईसीयू में सीपीआर तब दिया जाता है जब मरीज का दिल धड़कना बंद हो जाए, सांस रुक जाए या वो पूरी तरह बेहोश हो जाए और नब्ज भी न मिले. लेकिन डॉ. कालंत्री का कहना है कि हर स्थिति में सीपीआर देना जरूरी नहीं होता, खासकर तब जब मरीज की हालत बहुत गंभीर हो और ठीक होने की कोई उम्मीद न हो.

अपने 40 साल के करियर में हजारों मरीजों को आईसीयू में आखिरी सांस लेते देखने वाले डॉ. कालंत्री का मानना है कि इतनी लंबी और सम्मानित जिंदगी जीने वाले व्यक्ति को दर्दनाक मेडिकल प्रक्रियाओं के बजाय इस दुनिया से शांति से विदाई मिलनी चाहिए. उन्होंने कहा कि असली इलाज सिर्फ जिंदगी बिना मतलब किसी भी कीमत पर बढ़ाना नहीं है, बल्कि ये समझना भी है कि कब मशीनों को हटाकर इंसान को सुकून से जाने दिया जाए.

डॉक्टरों के बीच छिड़ी बहस
डॉ. कालंत्री के इस ट्वीट के बाद कई डॉक्टरों ने उनसे असहमति जताई और अपनी-अपनी राय रखी. कुछ डॉक्टरों का कहना है कि किसी भी डॉक्टर की पहली जिम्मेदारी मरीज की जान बचाना होता है और वो आखिरी सांस तक कोशिश करते हैं. वहीं, कई डॉक्टरों ने ये भी कहा कि इलाज के दौरान मरीज और उसके परिवार की इच्छा सबसे ऊपर होती है अगर वो इलाज जारी रखना चाहते हैं, तो डॉक्टरों को वही करना चाहिए.

क्या कहता है कानून?
भारत में मरीज का इलाज किस तरह किया जाना चाहिए और किस हद तक किया जाना चाहिए इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 और 2023 में अहम फैसले दिए हैं, जिनमें लिविंग विल या एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव को कानूनी मान्यता दी गई है. इसका मतलब है कि 18 साल से ऊपर का कोई भी व्यक्ति पहले ही लिखकर तय कर सकता है कि अगर उसे कोई गंभीर बीमारी हुई है या कोमा जैसी स्थिति में उसे कौन-सा इलाज दिया जाए या नहीं.

इसी के तहत डॉक्टर जरूरत पड़ने पर लाइफ सपोर्ट हटा सकते हैं. इसे पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) कहा जाता है, जो अब भारत में मान्य है.

डॉ. कालंत्री का कहना है कि भारत में कई डॉक्टर मौत को अपनी हार की तरह देखते हैं. इसलिए वो हर तरह के इलाज और मशीनों से मरीज का इलाज करना चाहते हैं, भले ही उससे मरीज को फायदा न हो. कई बार डॉक्टर भविष्य में होने वाली कानूनी परेशानी से बचने के लिए हर कदम उठाते हैं. लेकिन असली समस्या ये है कि परिवार को सही तरीके से ये नहीं समझाया जाता कि अब इलाज का कोई फायदा नहीं है.

भारत में ‘कोड स्टेटस’ है जरूरी?
दिल्ली के क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट डॉ.राज के मनी के अनुसार, विदेशों में अस्पताल में भर्ती होते समय ही ये तय कर लिया जाता है कि मरीज को सीपीआर देना है या नहीं. इसे कोड स्टेटस कहा जाता है. हालांकि, भारत में ये सिस्टम अभी आम नहीं है. आईसीएमआर की 2020 गाइडलाइन के अनुसार, डीएनआर (डू नॉट रेस्यूसिटेट) का फैसला मरीज, उसके परिवार और डॉक्टर मिलकर ले सकते हैं, लेकिन जमीनी तौर पर इसका पालन बहुत कम होता है.

कैसे हुआ आशा भोसले का निधन?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, आशा भोसले को अस्पताल में भर्ती कराने से पहले छाती में गंभीर इंफेक्शन और कमजोरी की शिकायत थी. इसी के इलाज के लिए उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. लेकिन उनकी हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती चली गई और मल्टीपल-ऑर्गन फेलियर हो गया, जिसके बाद कार्डियक अरेस्ट से उनका निधन हो गया.

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