मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रही जंग ने सिर्फ बम और मिसाइलों तक ही तबाही नहीं मचाई है, बल्कि अब इसकी आंच दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की तिजोरी तक पहुंच गई है.  दरअसल, UAE ने अमेरिका से एक बेहद खास ‘आर्थिक लाइफलाइन’ मांगी है ताकि उसकी इकोनॉमी को डूबने से बचाया जा सके. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, असल ट्विस्ट तब आया जब अमीराती अधिकारियों ने अमेरिका को बातों-बातों में संकेत दे दिया कि अगर उसे डॉलर की मदद नहीं मिली, तो वह मजबूरी में तेल बेचने के लिए चीनी ‘युआन’ का रास्ता चुन सकता है. यह एक ऐसा दांव है जिसने वॉशिंगटन के अधिकारियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है.

‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, असल में UAE को डर सता रहा है कि अगर ईरान के साथ यह टकराव और लंबा खिंचा, तो तेल से आने वाली उसकी कमाई पूरी तरह ठप हो सकती है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज, जहां से दुनिया का सबसे ज्यादा तेल गुजरता है, वहां नाकेबंदी की वजह से अमीराती टैंकर निकल नहीं पा रहे हैं. जब तेल और गैस नहीं बिकेगा, तो डॉलर नहीं आएगा. ऐसे में अपनी करेंसी ‘दिरहम’ को स्थिर रखने और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए UAE ने अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के साथ गुप्त चर्चा शुरू की है. वे चाहते हैं कि अमेरिका उन्हें ‘करेंसी-स्वैप लाइन’ की सुविधा दे, यानी एक ऐसा इंतजाम जिससे जरूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत और सस्ते में डॉलर मिल सकें.

पिछले हफ्ते वॉशिंगटन में हुई बैठकों में UAE के सेंट्रल बैंक गवर्नर खालिद मोहम्मद बलामा ने अमेरिकी अधिकारियों को यह समझाने की कोशिश की कि उन्होंने अब तक तो युद्ध के बुरे असर को झेल लिया है, लेकिन आगे के लिए उन्हें एक ‘बैकअप’ चाहिए. उन्होंने साफ किया कि वे किसी भी बड़ी मुसीबत से पहले अपनी तैयारी पूरी रखना चाहते हैं. लेकिन इसी बातचीत के बीच उन्होंने एक कूटनीतिक चाल चली. उन्होंने अमेरिकी अफसरों से कहा कि चूंकि यह जंग राष्ट्रपति ट्रंप के ईरान पर हमले के फैसले के बाद शुरू हुई है, इसलिए अमेरिका की जिम्मेदारी बनती है कि वह उनके नुकसान की भरपाई में मदद करे. उन्होंने साफ तौर पर इशारा किया कि अगर डॉलर की कमी हुई, तो वे चीन के साथ हाथ मिलाने पर मजबूर होंगे.

डॉलर की बादशाहत पर खतरा

यही वो पॉइंट है जहां अमेरिका की चिंता बढ़ जाती है. पूरी दुनिया में डॉलर की धाक इसलिए है क्योंकि तेल का ज्यादातर कारोबार डॉलर में होता है. अगर UAE जैसे बड़े तेल उत्पादक ने युआन में लेन-देन शुरू कर दिया, तो डॉलर की ग्लोबल ताकत को तगड़ी चोट पहुंचेगी. ऐसे में माना जा रहा है कि यह UAE की तरफ से एक ‘छिपी हुई चेतावनी’ है. वे जानते हैं कि अमेरिका कभी नहीं चाहेगा कि खाड़ी देश चीन के करीब जाएं, इसलिए उन्होंने अपनी मदद पक्की करने के लिए चीन का नाम लिया है.

UAE के लिए यह चिंता वाजिब भी है. ईरान ने सीजफायर से पहले UAE पर करीब 2,800 ड्रोन और मिसाइलें दागी थीं. हालांकि, इनमें से ज्यादातर को हवा में ही मार गिराया गया, लेकिन इसने निवेशकों के मन में डर पैदा कर दिया है. दुबई और अबू धाबी जैसे शहर जो दुनिया के ‘फाइनेंशियल हब’ माने जाते हैं, वहां से पैसा बाहर निकलने का खतरा बढ़ गया है. अगर निवेशक अपना पैसा निकालने लगे, तो मार्केट गिर जाएगा और देश के पास मौजूद 270 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भी कम पड़ सकता है. उधर, हॉर्मुज में जहाजों का चक्का जाम होने से तेल और गैस की सप्लाई पहले ही बाधित है.

फिलहाल, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के लिए UAE को यह सुविधा देना इतना आसान नहीं है. आमतौर पर अमेरिका यह ‘स्वैप लाइन’ सिर्फ अपने करीबी साथियों जैसे कनाडा, जापान या यूरोपीय देशों को ही देता है. लेकिन UAE का मामला अलग है. वहां के राजाओं ने हाल ही में अलग-अलग जगहों से करीब 4 अरब डॉलर का कर्ज भी उठाया है ताकि हाथ में कैश बना रहे. दूसरी तरफ, सऊदी अरब के वित्त मंत्री ने भी चेतावनी दी है कि इस तबाही के बाद हालात को पटरी पर आने में लंबा वक्त लगेगा. ऐसे में UAE का यह ‘चीन वाला दांव’ अमेरिका को मजबूर कर सकता है कि वह अपने इस पुराने दोस्त को डूबने से बचाने के लिए डॉलर की तिजोरी खोल दे.

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